भारतीय युवाओं में कॉर्निया से जुड़ी दृष्टि हीनता बढ़ रही : विशेषज्ञ
संतोष अविनाश
- 04 Aug 2025, 09:55 PM
- Updated: 09:55 PM
नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) कॉर्निया से जुड़ी दृष्टि हीनता (कॉर्नियल ब्लाइंडनेस) की समस्या भारतीय युवाओं में एक बड़े खतरे के रूप में उभर रही है जबकि कभी इसे केवल बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था।
दृष्टि हीनता का यह गंभीर, फिर भी काफी हद तक रोकथाम योग्य कारण देश भर के किशोरों और युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है।
इस चिंताजनक प्रवृत्ति को हाल ही में दिल्ली में आयोजित ‘इंडियन सोसाइटी ऑफ कॉर्निया एंड केराटो-रिफ्रैक्टिव सर्जन्स (आईएससीकेआरएस) मीट-2025’ में उजागर किया गया, जहां भारत भर के प्रमुख नेत्र रोग विशेषज्ञ इस बात पर चर्चा करने के लिए एकत्रित हुए कि यह एक राष्ट्रीय नेत्र स्वास्थ्य आपातकाल कैसे बनता जा रहा है।
सम्मेलन में आईएससीकेआरएस महासचिव और नयी दिल्ली स्थित एम्स में नेत्र विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. राजेश सिन्हा ने कहा कि भारत में कॉर्निया से जुड़ी दृष्टि हीनता के नए मामले अब 30 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों में बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘हम एक खतरनाक बदलाव देख रहे हैं। युवा ऐसी स्थितियों के कारण अपनी दृष्टि खो रहे हैं जो पूरी तरह से टाली जा सकती है। साधारण संक्रमण, अनुपचारित चोटें और जागरूकता की कमी स्थायी दृष्टि हीनता में बदल रही है।’’
‘कॉर्नियल ब्लाइंडनेस’ तब होता है जब आंख का पारदर्शी अग्र भाग (कॉर्निया) संक्रमण, आघात या पोषण संबंधी कमियों के कारण धुंधला हो जाता है या दागदार हो जाता है।
‘कॉर्नियल अपारदर्शिता’ अब भारत में दृष्टि हीनता का दूसरा प्रमुख कारण है, जिससे हर साल हजारों लोग प्रभावित होते हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में हर साल कॉर्निया संबंधी दृष्टि हीनता के 20,000 से 25,000 नए मामले दर्ज होते हैं, और यह संख्या बढ़ती ही जा रही है।
सर गंगा राम अस्पताल और दिल्ली आई सेंटर में वरिष्ठ सलाहकार (कॉर्निया, मोतियाबिंद और रिफ्रैक्टरी सर्जरी) डॉ. इकेदा लाल ने कहा, ‘‘यह अस्वीकार्य है कि 2025 में भी हम हजारों युवाओं की आंखों को पूरी तरह से रोके जा सकने वाले कारणों की वजह से खो रहे हैं। भारत को युवाओं में ‘कॉर्नियल ब्लाइंडनेस’ को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में देखना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि मजबूत सामुदायिक भागीदारी वाली एक राष्ट्रीय रणनीति समय की मांग है।
भाषा संतोष