महिलाओं के खिलाफ भेदभाव व्यापक रूप से प्रचलित है, कन्या भ्रूण हत्या इसका घिनौना उदाहरण : न्यायालय
नेत्रपाल
- 23 Feb 2026, 07:53 PM
- Updated: 07:53 PM
नयी दिल्ली, 23 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि महिलाओं, विशेषकर बालिकाओं के खिलाफ भेदभाव देश के कई हिस्सों में व्यापक रूप से प्रचलित है और कन्या भ्रूण हत्या इस सामाजिक बुराई का एक क्रूर उदाहरण है।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने गुरुग्राम के एक रेडियोलॉजिस्ट के खिलाफ गर्भाधान पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) (पीसीपीएएनडीटी) अधिनियम, 1994 के तहत दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया और कहा कि वे उसके खिलाफ मुकदमे को शुरू में ही समाप्त नहीं कर सकते।
पीठ ने कहा, "देश के कई हिस्सों में आज भी बालिकाओं और महिलाओं के प्रति भेदभाव व्याप्त है। इस सामाजिक बुराई का क्रूर और घिनौना रूप कन्या भ्रूण हत्या के रूप में देखने को मिलता है। इस प्रकार के अपराध को अंजाम देने की दिशा में पहला कदम भ्रूण के लिंग का निर्धारण करना है।"
इसने कहा है कि संसद ने न केवल लिंग निर्धारण और चयन को गैरकानूनी घोषित किया है, बल्कि इससे संबंधित सभी गर्भाधान पूर्व और प्रसव पूर्व तकनीकों एवं प्रक्रियाओं पर भी रोक लगा दी है, और निर्धारित प्रारूप में संबंधित रिकॉर्ड रखना अनिवार्य कर दिया है।
पीठ ने कहा, "निर्धारित प्रारूप में रिकॉर्ड न रखना पीसीपीएएनडीटी अधिनियम और नियमों के तहत अपराध होगा। जहां तक वर्तमान मामले का संबंध है, प्रथम दृष्टया यह रिकॉर्ड में आया है कि अपीलकर्ता ने गर्भवती महिला का अल्ट्रासोनोग्राफी कराया था।"
इसने कहा, "क्या उसने कानून के अनुसार आवश्यक रिकॉर्ड बनाए रखा है या नहीं, साथ ही भ्रूण के लिंग का खुलासा न करना, मुकदमे का विषय है। इसलिए, यह ऐसा मामला नहीं है जिसे मुकदमे की शुरुआत में ही रोक दिया जाए।"
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा कि गुरुग्राम के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित मामले को रद्द नहीं किया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, "अतः, उच्च न्यायालय के निर्णय और आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, हम यह स्पष्ट करते हैं कि हमने आरोपों की सत्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और साक्ष्यों की विश्वसनीयता एवं स्वीकार्यता से संबंधित सभी आपत्तियों का विकल्प खुला रखा गया है।"
भाषा प्रशांत नेत्रपाल
नेत्रपाल
2302 1953 दिल्ली