जंगलमहल में माओवादी हिंसा के पीड़ितों ने तृणमूल पर उनकी अनदेखी करने का आरोप लगाया
सिम्मी
- 18 Apr 2026, 02:51 PM
- Updated: 02:51 PM
(सौगत मुखोपाध्याय)
लालगढ़ (पश्चिम बंगाल), 18 अप्रैल (भाषा) झारग्राम जिले में लालगढ़ के बांधगोरा गांव में अपने जर्जर कच्चे मकान के आंगन में पड़ी खाट पर बैठीं करीब 50 साल की बिदु सिंह के पक्के घर का निर्माण शुरू हो गया है लेकिन अब उनकी भावशून्य आंखों में किसी बात को लेकर उत्साह नजर नहीं आता।
बिदु ने बताया कि दो दशक से अधिक समय पहले हथियारबंद नक्सलियों के हमले में उनके पति कार्तिक की मौत हो गई थी।
उन्होंने कहा कि नक्सलियों ने कार्तिक को पास के जंगल में एक पेड़ से बांधकर उनके शरीर के अलग-अलग हिस्सों में गोलियां मारी थीं।
बिदु ने बताया कि उनके पति एक छोटे किसान थे और पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट (माकपा) की सरकार का समर्थन करने के लिए उन्हें 2005 में कथित तौर पर हथियारबंद माओवादी पास के बाजार से घसीटकर ले गए थे।
उन्होंने कहा कि उनके पति ने पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी माकपा का खुलकर समर्थन किया था और नक्सलियों के हिंसक तरीकों का विरोध किया था जिसके कारण उन्हें प्रताड़ित करके मार डाला गया।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने माओवादी हिंसा के पीड़ितों के लिए मुआवजा पैकेज के तहत बिदु के बेटे शुभेंदु को लालगढ़ थाने में 'स्पेशल होम गार्ड' की नौकरी दी।
बिदु ने बताया कि बेटे को नौकरी मिलने के बाद वह रिश्तेदारों की अतिरिक्त आर्थिक मदद से अपनी बेटी की शादी कर सकीं और फिलहाल किसी तरह घर का खर्च चला पा रही हैं, हालांकि यह बहुत मुश्किल से हो रहा है।
उन्होंने कहा, "मेरे बेटे ने कुछ पैसे बचाए हैं और नया घर बनाने के लिए कर्ज लिया है, क्योंकि हमारा मौजूदा मकान ढहने के कगार पर था।"
बिदु से जब पूछा गया कि क्या वह इस बार चुनाव में ममता बनर्जी का समर्थन करेंगी, क्योंकि उनकी सरकार ने उनके परिवार की मदद की थी तो वह कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
उन्होंने कहा, "जिन माओवादियों ने बाद में आत्मसमर्पण किया, उन्हें भी इसी सरकार ने वही मुआवजा पैकेज दिया है; उनमें से कुछ मेरे बेटे के साथ उसी थाने में काम कर रहे हैं। यह कैसा न्याय है?"
बिदु के घर से कुछ दूरी पर उसी गांव के आदिवासी निवासी और एक स्थानीय स्कूल में चपरासी पुलिन मुर्मू ने अपने परिवार की मौजूदा स्थिति पर बात करने में शुरुआत में हिचक दिखाई।
उनका परिवार नवंबर 2008 में देशभर में सुर्खियों में आया था जब पुलिन की मां छितामोनी की आंख पर राज्य पुलिस की कार्रवाई के दौरान गंभीर चोट आई थी। यह कार्रवाई तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के काफिले पर हुए बारूदी सुरंग हमले के जवाब में की गई छापेमारी के दौरान हुई थी।
राइफल के पिछले हिस्से से किए गए वार से छितामोनी की आंख पर गहरी चोट लगी, जिसके बाद काफी खून बहा और खबरों के अनुसार उनकी दृष्टि को नुकसान पहुंचा।
यह घटना लालगढ़ के गांवों में पुलिस की व्यापक और कड़ी कार्रवाई का हिस्सा थी। इसके बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और 'पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज़ (पीओएपीए)"' का गठन हुआ। बाद में यह माओवादी जन मिलिशिया में बदल गई और सुरक्षा बलों के साथ हिंसक संघर्षों में शामिल रही। इसके बाद झाड़ग्राम की लाल मिट्टी खून से और लाल हो गई।
पुलिन ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, "मुझे जो नौकरी मिली है वह संविदा पर है, जिसमें सालाना केवल 500 रुपये की बढ़ोतरी होती है। इतनी तनख्वाह में घर चलाना मुश्किल है। काश, सरकार मुझे स्थायी नौकरी देती। भविष्य निधि और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं मिलतीं, तो मैं अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर पाता।"
करीब दो दशक पहले इस क्षेत्र में माओवाद बढ़ने के दौरान हुई हिंसा के पीड़ित लालगढ़ के ग्रामीणों ने पिछले 15 वर्षों के तृणमूल कांग्रेस शासन में अपने मानसिक घावों और दर्दनाक यादों पर किसी तरह मरहम लगाया है।
फिर भी, पार्टी के समर्थकों में गहरी निराशा दिख रही है, जिन्होंने अब सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर अपने परिवार की जरूरी जरूरतों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है।
लालगढ़ के निवासी और तृणमूल कांग्रेस के पूर्व कार्यकर्ता हेमचंद्र महाता ने कहा, "मुझे 2005 में माध्यमिक शिक्षा केंद्र (एमएसके) में नौकरी मिली थी, तब मेरी मासिक तनख्वाह 1,500 रुपये थी। अब 21 साल बाद मुझे 15,342 रुपये मिलते हैं। मेरी दो बेटियां उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं। अगर मैं राजनीति में समय दूं, तो उनका खर्च कैसे उठा सकूंगा?"
एमएसके और शिशु शिक्षा केंद्र (एसएसके) पूर्व वामपंथी सरकार के दौरान ग्रामीण बंगाल में ऐसे क्षेत्रों में स्थापित किए गए थे, जहां तीन किलोमीटर के दायरे में पारंपरिक स्कूल नहीं थे।
पीओएपीए के पूर्व नेता और अब तृणमूल कांग्रेस के नेता छत्रधर महाता ने कहा कि उन्हें इस बात का हमेशा दुख रहेगा कि वह माओवादी के गढ़ रह चुके इस इलाके में हिंसा से तबाह हुए हजारों परिवारों के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाए।
उन्होंने कहा कि ज्यादातर परिवार आज भी वामपंथी उग्रवाद से जुड़े मामलों में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं और आर्थिक बोझ से जूझ रहे हैं।
महाता ने कहा, "नौ अगस्त 2010 को विपक्षी नेता के तौर पर ममता बनर्जी ने लालगढ़ में एक जनसभा की थी, जिसमें उन्होंने सत्ता में आने के बाद उग्रवाद से जुड़े हजारों मामलों को वापस लेने और पीड़ितों के पुनर्वास का वादा किया था। वह अब तक अपना वादा पूरा नहीं कर पाई हैं।"
उन्होंने कहा कि 2020 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद 'जंगलमहल' क्षेत्र में 1,500 से अधिक लोगों को होम गार्ड के रूप में विशेष नियुक्ति दी गई है, लेकिन प्रभावित परिवारों की संख्या के मुकाबले यह बहुत कम है।
झाड़ग्राम में तृणमूल कांग्रेस की चुनाव समिति के अध्यक्ष प्रसून सारंगी ने कहा कि ममता बनर्जी के विकास एजेंडे से मतदाताओं की इस निराशा को कुछ हद तक कम किया जा सकेगा।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के पास इस क्षेत्र के बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों तक पहुंचने के लिए कोई व्यवस्थित तंत्र नहीं है और झाड़ग्राम एवं आसपास के बिनपुर विधानसभा क्षेत्रों में ही 800 से अधिक परिवार अदालती मामलों में फंसकर गरीबी की स्थिति में पहुंच गए हैं।
भाषा जोहेब सिम्मी
सिम्मी
1804 1451 लालगढ़