शांति अधिनियम चुनौती याचिका को न्यायालय ने बेहद संवेदनशील विधायी नीतिगत मुद्दा बताया
नरेश
- 19 May 2026, 07:13 PM
- Updated: 07:13 PM
नयी दिल्ली, 19 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने परमाणु ऊर्जा संयंत्र में किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की स्थिति में देयता की सीमा 3,000 करोड़ रुपये निर्धारित करने वाले 2025 के कानून के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को कहा कि यह ''एक बेहद संवेदनशील विधायी नीतिगत मुद्दा'' है।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने पाया कि भारत के रूपांतरण के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन एवं विकास (शांति) अधिनियम, 2025 के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका में उठाए गए मुद्दे ''आर्थिक नीति'' से संबंधित हैं।
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, ''हमारी चिंता यह है कि यदि कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना होती है और किसी व्यक्ति को चोट या क्षति पहुंचती है, तो क्या हमारे पास इसके लिए एक मजबूत मुआवजा तंत्र मौजूद है?''
अदालत में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए, अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कुल दायित्व की सीमा तय करने सहित तीन मुख्य मुद्दे हैं।
भूषण ने 2011 में जापान में हुई फुकुशिमा दाइची परमाणु ऊर्जा संयंत्र दुर्घटना का हवाला देते हुए दलील दी, ''यदि कोई परमाणु दुर्घटना होती है तो उससे होने वाला नुकसान इससे सैकड़ों गुना अधिक होता है।''
उन्होंने दलील दी कि सरकार नीति के माध्यम से जो चाहे कर सकती है लेकिन वह नागरिकों के अधिकारों की बलि नहीं चढ़ा सकती।
पीठ ने कहा, ''यह एक अत्यंत संवेदनशील विधायी नीतिगत मुद्दा है।'' पीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि प्रौद्योगिकी बाहर से ही लानी होगी और आश्चर्य व्यक्त किया कि यदि दायित्व की सीमा तय नहीं की गई तो यहां संचालन करने कौन आएगा।
न्यायालय ने कहा कि ऐसी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के होने पर सरकार भी मुआवजा देगी।
पीठ ने टिप्पणी की कि दायित्व पर सीमा लगाने से किसी भी घटना के पीड़ित को दिए जाने वाले मुआवजे का निर्धारण करने की न्यायालय की शक्ति पर कोई असर नहीं पड़ता।
भूषण ने दलील दी कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की लागत सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की लागत से कहीं अधिक है।
उन्होंने कहा, ''मैं अदालत से सरकार की किसी नीति में हस्तक्षेप करने का अनुरोध नहीं कर रहा हूं। लेकिन वह नीति नागरिकों की सुरक्षा की तिलांजिल नहीं दे सकती।'' उन्होंने दावा किया कि अधिनियम के कुछ प्रावधान असंवैधानिक हैं।
पीठ ने कहा, ''आप हमें एक भी ऐसा देश बताइए, चाहे वह विकसित हो या विकासशील, जो परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के माध्यम से बिजली का उत्पादन नहीं करता हो।''
भूषण ने कहा कि जापान और जर्मनी जैसे देशों ने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से बिजली उत्पादन करना बंद कर दिया है और वहां देयता पर कोई सीमा नहीं है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका में यह सीमा 1.54 लाख करोड़ रुपये है, जो भारत में निर्धारित सीमा से 100 गुना अधिक है।
भूषण ने दावा किया कि यह अधिनियम विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को सुरक्षा मानकों में ढिलाई बरतने के लिए प्रोत्साहित करता है।
पीठ ने कहा कि वह इस मामले की विस्तार से सुनवाई करेगी।
न्यायालय ने मामले की सुनवाई जुलाई के लिए तय करते हुए कहा, ''आपकी कुछ आशंकाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है। हम उन आशंकाओं को स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे।''
याचिका में कहा गया है, ''हाल ही में लागू किए गए शांति अधिनियम, 2025 ने निजी क्षेत्र और विदेशी कंपनियों को भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र संचालित करने की अनुमति तो दी है, लेकिन साथ ही इन संचालकों की जवाबदेही को बेहद कम स्तर पर सीमित कर दिया है और आपूर्तिकर्ता को किसी भी प्रकार की जवाबदेही से मुक्त कर दिया है।''
भाषा सुभाष नरेश
नरेश
1905 1913 दिल्ली