'चौंकाने वाले आदेश' न्यायपालिका के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर करते हैं: न्यायालय
नरेश
- 22 May 2026, 05:41 PM
- Updated: 05:41 PM
नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि अदालत द्वारा पारित 'चौंकाने वाले आदेश' न्यायपालिका के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर करते हैं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण के कार्यवाहक अध्यक्ष को प्रशासनिक अवकाश पर भेजने के लिए गुजरात सरकार को उचित निर्देश देने के आदेश को चुनौती देने के लिए दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
शीर्ष अदालत गुजरात उच्च न्यायालय के सितंबर 2024 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण के तत्कालीन कार्यवाहक अध्यक्ष ने 2024 में दो ''बिल्कुल अलग-अलग आदेश'' पारित किए थे, विशेष रूप से किसी मामले में देरी की माफी के पहलू पर।
न्यायाधिकरण के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की, ''जिस तरह से उन्होंने (कार्यवाहक अध्यक्ष) दोनों आवेदनों पर काम किया, वह हमारी अंतरात्मा को झकझोर देता है।''
पीठ ने कहा, ''अगर आप कोई गलत आदेश पारित करते हैं, तो ऐसा हो सकता है... लेकिन अगर आप कोई चौंकाने वाला आदेश पारित करते हैं, तो इससे न्यायपालिका में लोगों का विश्वास कमजोर होता है।''
उच्चतम न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई करने की सहमति जताते हुए प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने कहा कि न्यायिक अधिकारी एक सेवानिवृत्त प्रधान और जिला न्यायाधीश हैं, जिनका सेवा रिकॉर्ड बेदाग है।
पीठ ने जब दोनों आदेशों का जिक्र किया तो वकील ने कहा कि यह एक ''त्रुटि'' थी।
वकील ने दलील दी कि जब न्यायिक अधिकारी न्यायाधिकरण में बैठकर मामलों की सुनवाई कर रहे थे, तब उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा गया।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ''हम नोटिस जारी कर रहे हैं। सरकार को अपना पक्ष रखने दीजिए।''
उच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण के कार्यवाहक अध्यक्ष द्वारा मई 2024 और अप्रैल 2024 में पारित आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया था।
उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि न्यायाधिकरण के समक्ष, अगस्त 1996 में उप कलेक्टर द्वारा किरायेदारी अपील में पारित एक सामान्य आदेश को चुनौती दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि अप्रैल 2024 के आदेश में, उप कलेक्टर द्वारा पारित आदेश में इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं किया गया था कि इसे चुनौती देने में 22 साल की देरी का कोई कारण नहीं बताया गया।
गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि मई 2024 में पारित आदेश में कहा गया कि न्यायाधिकरण ने देरी को माफ करने के लिए अलग से आवेदन किए बिना ही देरी को माफ कर दिया था।
उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने कहा था कि राज्य इस मुद्दे को उच्चतम स्तर पर बहुत गंभीरता से देख रहा है।
उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की थी, ' चूंकि राज्य इस मामले की उच्चतम स्तर पर जांच कर रहा है, इसलिए इस न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि राज्य को संबंधित सदस्य को निर्देश देना चाहिए कि जब तक राज्य इस बारे में अंतिम राय नहीं दे देता कि पारित आदेश न्यायसंगत थे या नहीं, तब तक वह आगे कोई भी मामला न उठाएं।''
उच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण द्वारा पारित दोनों आदेशों को 'कानूनी रूप से टिकने वाला नहीं' करार देते हुए रद्द कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने कहा था, ''राज्य, अर्थात् राजस्व विभाग के सचिव, यह भी सुनिश्चित करेंगे कि गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण के प्रभारी अध्यक्ष को दिन समाप्त होने से पहले उचित निर्देश जारी किए जाएं, जिसमें उन्हें संबंधित न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के रूप में उनके आचरण के संबंध में राज्य द्वारा उचित निर्णय लिए जाने तक प्रशासनिक अवकाश पर जाने का निर्देश दिया जाए।''
भाषा धीरज नरेश
नरेश
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