आपका शरीर वजन कैसे कम करता है? विशेषज्ञ बता रहे कि एक ही तरीका सबके लिए कारगर क्यों नहीं
प्रशांत
- 23 May 2026, 03:25 PM
- Updated: 03:25 PM
(किम पफोटेनहाउर, मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी)
मिशिगन, 23 मई (द कन्वरसेशन) दशकों से लोगों को बताया जाता रहा है कि वजन की समस्या का समाधान एक आसान गणितीय फार्मूले में छिपा है- जितनी कैलोरी लो और उतनी कम करो। अगर वजन घटाने का गणित वास्तव में इतना सरल होता, तो शायद अधिकतर लोग अपने मनचाहे वजन तक पहुंच चुके होते, लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है।
वजन कम करना इतना मुश्किल क्यों होता है, इसे लेकर कई सिद्धांत मौजूद हैं। कुछ विशेषज्ञ इसके लिए आनुवंशिकी और उपापचय को जिम्मेदार मानते हैं, जबकि कुछ का कहना है कि पर्यावरण और सामाजिक परिस्थितियां अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सवाल यह है कि इनमें से कौन-सा सिद्धांत सही है? क्या किसी व्यक्ति का वजन उसकी आनुवंशिकी, उपापचय या माहौल पहले से तय कर देता है?
मैं मधुमेह और मोटापे के इलाज से जुड़ा चिकित्सक हूं। इन सिद्धांतों के बारे में क्या ज्ञात है और क्या अब भी अनिश्चित है, उसे समझने से आपको अपनी जैविक संरचना से पार पाकर वजन बदलने में मदद मिल सकती है।
'सेट प्वाइंट' वजन का सिद्धांत
'सेट प्वाइंट वेट' की अवधारणा 1950 के दशक से मौजूद है। इसके अनुसार, शरीर में एक ऐसी जैविक प्रणाली होती है जो शरीर में एक तय स्तर तक वसा (फैट) बनाए रखने की कोशिश करती है। यह प्रणाली भूख और ऊर्जा खर्च होने की प्रक्रिया को नियंत्रित करके वजन को एक निश्चित स्तर के आसपास बनाए रखती है। यह स्तर आनुवंशिकी, शारीरिक संरचना और माहौल जैसे कारकों से प्रभावित होता है।
इस सिद्धांत को उन अध्ययनों से समर्थन मिलता है जिनमें देखा गया कि वजन कम होने के बाद लोगों की भूख बढ़ जाती है और शरीर की ऊर्जा खर्च करने की क्षमता घट जाती है, जब तक कि वजन फिर से पहले जैसा न हो जाए।
सिद्धांत रूप में यह प्रक्रिया शरीर को भूख से बचाती है, भले ही वजन काफी कम हो गया हो। एक अध्ययन में पाया गया कि वजन घटने के 62 सप्ताह बाद तक भी भूख बढ़ाने वाले हार्मोन ऊंचे स्तर पर बने रहते हैं, जबकि पेट भरने का संकेत देने वाले हार्मोन दबे रहते हैं।
इससे जुड़ी एक और अवधारणा 'उपापचय अनुकूलन' है, जो ऊर्जा संतुलन को प्रभावित करती है। इसका मतलब यह है कि वजन घटने के बाद शरीर अपेक्षा से कम कैलोरी खर्च करने लगता है। दूसरे शब्दों में, समान वजन वाले उस व्यक्ति की तुलना में जिसने हाल में वजन नहीं घटाया हो, वजन कम करने वाला व्यक्ति कम कैलोरी खर्च करता है।
'उपापचय अनुकूलन' का असर भूख बढ़ने और शरीर की 'रेस्टिंग मेटाबॉलिक रेट' घटने के रूप में दिखाई देता है। 'रेस्टिंग मेटाबॉलिक रेट' वह ऊर्जा है जो शरीर दिल की धड़कन, सांस लेने, तापमान नियंत्रित रखने और पाचन जैसी मूल प्रक्रियाओं के लिए खर्च करता है, भले ही व्यक्ति पूरे दिन बिस्तर पर ही क्यों न लेटा रहे।
करीब पांच प्रतिशत वजन कम होने के बाद 'रेस्टिंग मेटाबॉलिक रेट' घटने लगता है, जबकि लगभग 10 प्रतिशत वजन घटने पर व्यायाम से खर्च होने वाली ऊर्जा भी कम हो जाती है। यानी जैसे-जैसे व्यक्ति का वजन घटता है, शरीर को जीवित रखने के लिए जरूरी प्रक्रियाओं में कम ऊर्जा खर्च होती है। साथ ही, वजन घटाना जारी रखने के लिए व्यक्ति को और अधिक व्यायाम करना पड़ता है। इस तरह, जितना अधिक वजन घटता है, आगे वजन कम करना उतना ही कठिन हो जाता है।
कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया कि ऊर्जा खर्च होने में यह कमी वर्षों तक बनी रह सकती है। टीवी शो 'द बिगेस्ट लूजर' के प्रतिभागियों पर हुए अध्ययन में ऐसा देखा गया। हालांकि, कुछ अन्य शोधों में यह प्रभाव उतना बड़ा नहीं पाया गया जितना पहले माना जाता था।
वजन घटाने के दौरान होने वाले इन बदलावों से निपटने के लिए कई रणनीतियां अपनाई जाती हैं। 'बेरियाट्रिक सर्जरी' यानी वजन घटाने की सर्जरी से भूख कम होती है और ऊर्जा खर्च में कमी नहीं आती, जिससे यह शरीर के 'सेट प्वाइंट' को बदलती हुई दिखाई देती है।
इसी तरह, जीएलपी-1 जैसी दवाएं भी वजन घटाने में मदद करती हैं और संभव है कि वे 'उपापचय अनुकूलन' को प्रभावित किए बिना ऐसा करें। पोषण संबंधी उपायों में अधिक प्रोटीन लेना, अधिक फाइबर वाले खाद्य पदार्थ खाना और उच्च ग्लाइसेमिक भोजन कम करना शामिल है, हालांकि इन तरीकों की प्रभावशीलता को लेकर साक्ष्य अलग-अलग हैं।
'सेट प्वाइंट' सिद्धांत का मूल विचार यह है कि शरीर का एक मनचाहा वजन होता है और वह भूख को बदलकर व्यक्ति को उसी वजन के आसपास बनाए रखने की कोशिश करता है।
'सेटलिंग प्वाइंट' मॉडल
'सेट प्वाइंट' सिद्धांत के विकल्प के रूप में 'सेटलिंग प्वाइंट' मॉडल सामने आया। इसके अनुसार, वजन का नियंत्रण किसी जैविक प्रणाली द्वारा सक्रिय रूप से नहीं किया जाता, बल्कि यह व्यक्ति की आदतों और वातावरण का परिणाम होता है।
इस मॉडल में 'सेटलिंग प्वाइंट' वह स्थिति है जहां शरीर का वजन स्थिर हो जाता है, क्योंकि जितनी कैलोरी हम लेते हैं, उतनी ही खर्च कर देते हैं। यह शरीर के द्रव्यमान को बनाए रखने की शारीरिक अभ्यास से तय होता है
जिन लोगों का शरीर भारी होता है, वे अधिक ऊर्जा खर्च करते हैं, क्योंकि भारी शरीर को चलाने और बनाए रखने में ज्यादा ऊर्जा लगती है। इसलिए भारी शरीर वाले लोगों को खाने की भी अधिक जरूरत होती है।
पहली नजर में यह मॉडल पुराने सिद्धांत "जितनी कैलोरी लो, उतनी खर्च करो" जैसा लग सकता है, लेकिन इसमें सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को भी शामिल किया गया है।
इसे एक खुले कमरे की खिड़की की तरह समझा जा सकता है। दिन में धूप से कमरा गर्म हो सकता है और रात में ठंडा। समय के साथ कमरे का तापमान एक स्तर के आसपास स्थिर हो जाता है, हालांकि मौसम के अनुसार उसमें बदलाव आता रहता है।
अब इसे व्यक्ति पर लागू करें। यदि किसी का काम ऐसा है जिसमें वह दिनभर सक्रिय रहता है और घर का बना खाना खाता है, तो उसका वजन स्थिर रह सकता है। लेकिन यदि वही व्यक्ति लंबे समय तक बैठकर काम करने लगे और ज्यादा कैलोरी वाला भोजन खाने लगे, तो उसका वजन बढ़ सकता है और फिर एक नए स्तर पर जाकर स्थिर हो जाएगा।
हालांकि, यह मॉडल वजन के जैविक और आनुवंशिक पहलुओं की पूरी तरह व्याख्या नहीं कर पाता।
'ड्यूल इंटरवेंशन प्वाइंट' मॉडल
'ड्यूल इंटरवेंशन प्वाइंट' मॉडल, 'सेट प्वाइंट' और 'सेटलिंग प्वाइंट' दोनों सिद्धांतों को जोड़ता है। इसके अनुसार, हर व्यक्ति के शरीर के लिए एक अधिकतम और न्यनतम सीमा होती है, जिसके भीतर उसका वजन सामान्य रूप से बना रहता है।
न्यूनतम सीमा वह बिंदु है जहां शरीर भूख से बचने के लिए सक्रिय हो जाता है। यदि वजन इस सीमा से नीचे जाने लगे, तो शरीर भूख बढ़ा देता है और ऊर्जा खर्च कम कर देता है, ताकि और वजन न घटे।
वहीं, सिद्धांततः जब वजन अधिकतम सीमा से ऊपर जाता है, तो शरीर को आगे वजन बढ़ने से रोकने के लिए सक्रिय होना चाहिए। जानवरों पर हुए कई अध्ययनों में ऐसा देखा गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अधिक वजन वाले जानवर शिकारी जीवों का आसान शिकार बन जाते थे।
हालांकि, इंसानों में इस प्रक्रिया के स्पष्ट प्रमाण कम मिले हैं।
आखिर कौन-सा सिद्धांत सबसे सही है?
तो शरीर के वजन को नियंत्रित करने वाला कौन-सा सिद्धांत सही है? इसका सीधा जवाब यह है कि इनमें से कोई भी सिद्धांत वास्तविक जीवन की स्थितियों को पूरी तरह नहीं समझा पाता।
हालांकि, यह स्पष्ट दिखता है कि सक्रिय रूप से वजन घटाने और वजन को स्थिर बनाए रखने के दौरान शरीर का उपापचय अलग तरह से काम करता है। इसलिए दोनों लक्ष्यों को हासिल करने के तरीके भी अलग हो सकते हैं।
वजन घटाने के लिए भोजन की मात्रा कम करना अधिक प्रभावी माना जाता है, जबकि वजन को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने में नियमित व्यायाम अहम भूमिका निभाता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वजन संतुलन एक जटिल प्रक्रिया है। यह केवल गणित का आसान सवाल नहीं है। मोटापा और अधिक वजन का प्रभावी इलाज पोषण, व्यायाम, नींद, तनाव और अन्य कई कारकों पर निर्भर है। जरूरत पड़ने पर दवाओं या सर्जरी की मदद भी ली जा सकती है।
वजन घटने की प्रक्रिया हमेशा सीधी रेखा की तरह नहीं होती और बीच-बीच में ठहराव आना सामान्य बात है। हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए कोई एक सिद्धांत या तरीका सभी पर समान रूप से लागू नहीं हो सकता।
द कन्वरसेशन खारी प्रशांत
प्रशांत
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