न्यायालय ने तीन राज्यों को वनकर्मियों से जुड़ी मुआवजा नीति के बारे में जानकारी देने का निर्देश दिया
सुरेश
- 26 May 2026, 09:23 PM
- Updated: 09:23 PM
नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों से कहा कि वे उसे उन मौजूदा नीतिगत प्रारूप के बारे में जानकारी उपलब्ध कराएं जो कर्तव्य निर्वहन के दौरान मृत्यु या गंभीर चोट के शिकार वन रक्षकों और अग्रिम पंक्ति के कर्मियों को मुआवज़ा देने से संबंधित हैं।
न्यायालय ने यह आदेश मध्यप्रदेश वन कर्मचारी संघ द्वारा दायर एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवर्तन और संरक्षण कर्तव्यों का पालन करने वाले अग्रिम पंक्ति के वनकर्मियों की सुरक्षा, कल्याण और सेवा शर्तों का मुद्दा उठाया गया था।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने अपने आदेश में कहा, ''आवेदन में उन खतरनाक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया है जिनके तहत वनरक्षकों और अन्य कर्मियों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है, जिनमें अवैध खनन कार्यों, शिकार गतिविधियों और वन अपराधों में शामिल संगठित समूहों के हमलों से उत्पन्न जोखिम शामिल हैं।''
यह आवेदन 'राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और लुप्तप्राय जलीय वन्यजीवों के लिए खतरा' शीर्षक वाले स्वतः संज्ञान मामले में दायर किया गया था।
शीर्ष न्यायालय ने कहा कि यह दलील दी गयी थी कि आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते समय वनकर्मियों की मृत्यु और घातक चोटों से जुड़ी कई घटनाओं के बावजूद, मध्यप्रदेश में ऐसे कर्मियों के परिवारों के लिए मुआवजे, अनुकंपा नियुक्ति, बीमा कवरेज और अन्य कल्याणकारी उपायों को नियंत्रित करने वाली कोई व्यापक और समान नीति मौजूद नहीं है।
पीठ ने कहा कि यद्यपि आवेदन मुख्य रूप से मध्यप्रदेश से संबंधित है, फिर भी उसका मत है कि उठाए गए मुद्दे केवल एक राज्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यापक प्रकृति के प्रतीत होते हैं और संबंधित राज्यों में कार्यरत अग्रिम पंक्ति के वनकर्मियों और प्रवर्तन कर्मचारियों पर सीधा प्रभाव डालते हैं।
पीठ ने आवेदन पर नोटिस जारी किया और राज्यों से जवाब मांगा।
पीठ ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे अपने जवाब दाखिल करें, जिसमें विशेष रूप से, यदि कोई हो, तो उन नीतिगत प्रारूप का उल्लेख करें जो उन वन रक्षकों और अन्य अग्रिम पंक्ति के वनकर्मियों को दिए जाने वाले मुआवजे, अनुग्रह सहायता, अनुकंपा नियुक्ति, बीमा कवरेज, कल्याणकारी उपायों और अन्य सेवा लाभों को नियंत्रित करते हैं, जिनकी आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान मृत्यु हो जाती है या जिन्हें घातक चोटें लगती हैं।
पीठ ने कहा कि जवाब में ऐसी नीतियों के कार्यान्वयन का विवरण और ऐसे कर्मियों के लिए लागू कल्याण और संरक्षण प्रारूप को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित उपायों का भी उल्लेख होना चाहिए।
पीठ ने इस मामले पर अगली सुनवाई की तारीख 22 जुलाई तय की है।
भाषा संतोष सुरेश
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