बुरी संगत से दूर रखने के लिए गुरनूर को खेलों से जोड़ना चाहते थे पिता
सुधीर
- 10 Jun 2026, 01:46 PM
- Updated: 01:46 PM
(कुशान सरकार)
चंडीगढ़, 10 जून (भाषा) जब सुखबीर सिंह बरार को पता चला कि उनके किशोर बेटे गुरनूर को क्रिकेट का बहुत शौक है तो वह उसके सपनों को पूरा करने में मदद करने के लिए तुरंत तैयार हो गए और इसके दो कारण थे।
पहला, वह वास्तव में एक सहयोगी पिता बनना चाहते थे। दूसरा, पंजाब पुलिस में एएसआई होने के नाते उन्हें लगा कि यह 17 साल के बेटे को 'बुरी संगत' से दूर रखने का एक शानदार तरीका है।
सुखबीर ने चंडीगढ़ के सेक्टर-125 में अपने आलीशान घर पर पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में अपने तेज गेंदबाज बेटे के सफर के बारे में बात करते हुए कहा, ''जब वह किशोरावस्था के आखिरी दौर में पहुंच रहा था तो मैं चाहता था कि मेरा बेटा पढ़ाई के साथ-साथ खेल में भी शामिल हो जिससे उसके पास किसी और चीज में पड़ने का समय नहीं बचे।''
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ''साथ ही व्यवस्थित कोचिंग का मतलब है कि आप बुरी संगत से दूर रहते हैं। और जैसे ही गुरनूर कोच रवि सर की देखरेख में 'चैम्प्स अकादमी' से जुड़ा तो उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।''
गुरनूर ने 11वीं कक्षा में क्रिकेट खेलना शुरू किया था और 26 साल की उम्र में वह भारत की टेस्ट और एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय टीम का हिस्सा हैं। उन्होंने हालांकि अब तक राष्ट्रीय टीम की ओर से पदार्पण नहीं किया है।
गुरनूर से सिर्फ एक इंच छोटे और छह फीट चार इंच लंबे सुखबीर अपने बेटे के उज्ज्वल भविष्य को लेकर काफी आश्वस्त हैं।
राष्ट्रीय बास्केटबॉल चैंपियनशिप 1995 में पंजाब का प्रतिनिधित्व कर चुके सुखबीर ने कहा, ''मैं एक पुलिसकर्मी हूं लेकिन मैं गुरनूर की मां (मनविंदर) से अधिक भावुक हो जाता हूं। जब हमें उसके भारत की टीम में चुने जाने की खबर मिली तो मेरी आंखों में आंसू आ गए थे।''
बरार परिवार को यह खबर उनके बेटे से बहुत ही सामान्य तरीके से मिली।
सुखबीर ने कहा, ''जिस दिन अफगानिस्तान टेस्ट के लिए टीम का ऐलान हुआ हम परिवार में किसी की मौत की वजह से मुक्तसर साहिब में अपने पुश्तैनी घर पर थे। गुरनूर अगर आईपीएल के दौरान शाम को अभ्यास करता था तो वह दोपहर में सो जाता था और हमेशा अपनी मां से कहता था कि उसे शाम चार बजकर 45 मिनट पर जगा दें।''
उन्होंने कहा, ''तो मेरी पत्नी ने उसे जगाने के लिए फोन किया और पूछा, 'क्या आज टीम का ऐलान नहीं होना था?' 'हां मां, मेरा चयन हो गया है।' बस इतना कहकर उसने फोन रख दिया।''
उन्हें याद है कि गुरनूर ने दूसरे बच्चों के मुकाबले काफी देर से क्रिकेट खेलना शुरू किया था जबकि दूसरे बच्चों को नौ या 10 साल की उम्र में ही अकादमी भेज दिया जाता है।
सुखबीर ने कहा, ''पुलिस में होने के कारण मेरे पास उनके (दोनों बेटों के) बड़े होने के दौरान बहुत कम समय होता था। गुरनूर की 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा पूरी होने के बाद मैंने उसे बास्केटबॉल खेलने के लिए कहा क्योंकि मैं खुद यह खेल खेलता था और हमारी लंबाई अच्छी है।''
उन्होंने कहा, ''गुरनूर ने दो-तीन हफ्ते तक इसे आजमाया लेकिन उसने कहा, 'पापा, मुझे इसमें मजा नहीं आ रहा है।''
भारत में विश्वविद्यालय क्रिकेट 1970, 80 और 90 के दशक के उलट अब उतना जबरदस्त नहीं रहा लेकिन गुरनूर को पहला बड़ा मौका तब मिला जब उन्होंने अंतर कॉलेज टूर्नामेंट में चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज का प्रतिनिधित्व किया और सेमीफाइनल तथा फाइनल दोनों में मैच में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बने।
उस समय गुरनूर को मोहाली जिला संघ ने कटोच शील्ड (पंजाब का सबसे बड़ा अंतर जिला टूर्नामेंट) के लिए चुना।
गुरनूर का आगे का सफर शानदार रहा। उसने अपनी लंबाई और अच्छी लेंथ से बल्लेबाजों को परेशान करने वाला उछाल हासिल करने की अपनी काबिलियत से राष्ट्रीय चयन समिति का ध्यान खींचा।
भारतीय टीम प्रबंधन ने उसे पहली बार नेट पर तब बुलाया था जब उन्हें छह फिट पांच इंच लंबे बांग्लादेशी तेज गेंदबाज नाहिद राणा जैसा अनुभव चाहिए था।
सुखबीर ने कहा, ''उसे खास तौर पर इसलिए बुलाया गया था जिससे कि वह बल्लेबाजों को बांग्लादेश के नाहिद राणा का सामना करने से पहले अभ्यास करा सके। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ए और दक्षिण अफ्रीका ए के खिलाफ घरेलू मुकाबालों में उसका प्रदर्शन शानदार रहा और अब उसे भारतीय टीम में बुलावा मिला है।''
गुरनूर भारत ए टीम के साथ चार दिवसीय दो मैच के लिए श्रीलंका जाएगा लेकिन अगर आप बरार सीनियर से पूछें कि क्या वे उसके साथ जाना चाहते हैं तो वह इससे इनकार कर देते हैं।
सुखबीर ने कहा, ''अगर मैं और मेरी पत्नी श्रीलंका जाएंगे तो उसे हमारी चिंता होगी। इस समय उसे सिर्फ अपने खेल पर ध्यान देना चाहिए।''
भाषा सुधीर
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1006 1346 चंडीगढ़