बच्चे बड़ों से सीखते हैं हर बात, अभिभावकों के व्यवहार से तय होती है उनकी सामाजिक समझ : विशेषज्ञ
माधव
- 11 Jun 2026, 05:32 PM
- Updated: 05:32 PM
( एंजेला जे नारायण - यूनिवर्सिटी ऑफ डेनवर )
डेनवर, 11 जून (द कन्वरसेशन) "मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुम्हें अपनी जन्मदिन पार्टी में नहीं बुलाऊंगा" या "अगर तुमने अपना टिफिन नहीं दिया तो मैं तुम्हारे साथ प्रोजेक्ट नहीं करूंगा" — स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच इस तरह की धमकियां और दबाव डालने वाली बातें आम हैं। कई बार माता-पिता और शिक्षक इन्हें बच्चों की सामान्य नोकझोंक मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।
लेकिन बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे व्यवहार की जड़ें अक्सर घर के वातावरण में होती हैं। बच्चे केवल यह नहीं सीखते कि क्या कहना है, बल्कि यह भी सीखते हैं कि दूसरों से अपनी बात कैसे मनवानी है। यदि वे बड़ों को धमकी, आलोचना, भावनात्मक दबाव या उपेक्षा जैसे तरीकों का इस्तेमाल करते देखते हैं, तो वे भी इन्हीं रणनीतियों को अपनाने लगते हैं।
एक बाल मनोवैज्ञानिक के अनुसार, बच्चे अपने वयस्कों का अनुकरण करते हैं। यही कारण है कि घर में होने वाले व्यवहार और बच्चों के सामाजिक आचरण के बीच गहरा संबंध होता है।
शोध बताते हैं कि धमकाने का असर केवल उस बच्चे पर नहीं पड़ता जो इसका शिकार होता है, बल्कि ऐसा करने वाले बच्चों पर भी पड़ता है। जो बच्चे दूसरों को डराकर या दबाव डालकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं, उनमें किशोरावस्था में अवसाद, आक्रामक व्यवहार, नियम तोड़ने की प्रवृत्ति और नशे जैसी समस्याओं का जोखिम अधिक होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी बात यह है कि माता-पिता अपने व्यवहार में बदलाव लाकर बच्चों को स्वस्थ और सम्मानजनक सामाजिक व्यवहार सिखा सकते हैं।
हर संस्कृति और स्वभाव के बच्चे दो मूल उद्देश्यों से प्रेरित होते हैं—जो वे चाहते हैं उसे हासिल करना और जो नहीं चाहते उससे बचना। वे प्यार, प्रशंसा, खिलौने, स्वादिष्ट भोजन और दोस्तों के साथ समय चाहते हैं। वहीं, वे पढ़ाई, घरेलू काम, जल्दी सोना या कठिन कार्यों से बचना चाहते हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि किसी से वह काम कैसे करवाया जाए जो वह नहीं करना चाहता। इसके लिए लोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के तरीके अपनाते हैं।
सकारात्मक तरीकों में विनम्र अनुरोध, प्रोत्साहन, प्रशंसा और पुरस्कार शामिल हैं। वहीं धमकी, भावनात्मक दबाव, हेरफेर और बल प्रयोग नकारात्मक तरीके माने जाते हैं।
बच्चे यह देखकर सीखते हैं कि उनके जीवन में प्रभावशाली वयस्क कौन-सी रणनीतियां अपनाते हैं और कौन-से व्यवहार स्वीकार्य माने जाते हैं।
मनोविज्ञान के प्रसिद्ध 'बोबो डॉल' अध्ययन ने दिखाया था कि जो बच्चे वयस्कों को आक्रामक व्यवहार करते देखते हैं, वे स्वयं भी अधिक आक्रामक हो जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जिन बच्चों ने कम उम्र में माता-पिता के बीच हिंसा या लगातार झगड़े देखे, उनके बड़े होने पर हिंसक होने की संभावना अधिक पाई गई। विशेष रूप से प्री-स्कूल उम्र में देखे गए व्यवहार बच्चों पर सबसे गहरा प्रभाव डालते हैं।
आज अधिकांश लोग शारीरिक बल का प्रयोग नहीं करते, लेकिन बच्चे यह भी देखते हैं कि वयस्क एक-दूसरे से कैसे बात करते हैं। यदि बच्चे बार-बार सुनते हैं कि "अगर तुमने यह नहीं किया तो तुम्हें वह नहीं मिलेगा" या "मैं तुमसे बात नहीं करूंगा", तो वे सीखते हैं कि धमकी देना एक प्रभावी तरीका है।
इसी तरह यदि माता-पिता एक-दूसरे की आलोचना करते हैं या उन्हें नीचा दिखाते हैं, तो बच्चे भी दूसरों की कमजोरियों का फायदा उठाना सीख जाते हैं।
घर में यदि कोई अभिभावक दूसरे को "आलसी", "अव्यवस्थित" या "निकम्मा" कहता है, तो बच्चे अपने साथियों से कह सकते हैं, "तुम हमारे साथ नहीं खेल सकते क्योंकि तुम्हारे कपड़े अच्छे नहीं हैं" या "तुम मेरे साथ काम करने लायक समझदार नहीं हो।"
इसी प्रकार 'साइलेंट ट्रीटमेंट' यानी किसी को नजरअंदाज करना, बात न करना या सामाजिक रूप से अलग कर देना भी बच्चे सीख सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जिस तरह नकारात्मक व्यवहार का असर पड़ता है, उसी तरह सकारात्मक व्यवहार भी बच्चों को गहराई से प्रभावित करता है।
जब माता-पिता एक-दूसरे से सम्मानपूर्वक बात करते हैं, धन्यवाद देते हैं, प्रशंसा करते हैं और टीम की तरह काम करते हैं, तो बच्चे स्वस्थ सामाजिक कौशल सीखते हैं।
ऐसे बच्चे न केवल दूसरों को धमकाने की संभावना कम रखते हैं, बल्कि वे स्वयं भी बुलिंग का सामना करने और उसका विरोध करने में अधिक सक्षम होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि परिवार में एक अभिभावक अधिक धैर्यवान और सहानुभूतिपूर्ण है तथा दूसरा अनुशासन बनाए रखने में बेहतर है, तो दोनों मिलकर बच्चों के पालन-पोषण में अपनी-अपनी ताकत का उपयोग कर सकते हैं।
और जब वे बच्चों के सामने एक-दूसरे की सराहना करते हैं—जैसे "आज समय पर निकलने में मां की वजह से मदद मिली" या "पापा की वजह से सब व्यवस्थित रहा"—तो बच्चे सम्मान और सहयोग का महत्व सीखते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जो बच्चे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए दयालुता, सम्मान और सहयोग का इस्तेमाल करना सीखते हैं, वे दूसरों के अपमानजनक या चतुराई से भरे व्यवहार को भी आसानी से स्वीकार नहीं करते।
उनके भीतर आत्मसम्मान और स्वस्थ संबंधों की समझ विकसित होती है, जिससे वे धमकी देने वाले या धौस जमाने वालों से दूरी बना सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे लगातार बड़ों को देखकर सीखते हैं। इसलिए माता-पिता के पास केवल बच्चों से काम करवाने की शक्ति नहीं होती, बल्कि यह जिम्मेदारी भी होती है कि वे उन्हें सम्मान, सहयोग, कृतज्ञता और संवेदनशीलता का व्यावहारिक उदाहरण दें।
उनका मानना है कि यदि यह सीख बच्चों को जीवन के शुरुआती वर्षों से ही मिले, तो वे भविष्य में अधिक संवेदनशील, आत्मविश्वासी और सकारात्मक सामाजिक व्यवहार वाले नागरिक बन सकते हैं।
द कन्वरसेशन
मनीषा माधव
माधव
1106 1732 डेनवर