उच्चतम न्यायालय ने संतान के रूप में लड़के की चाहत करने संबंधी पितृसत्तात्मक सोच पर चिंता जताई
माधव
- 11 Jun 2026, 05:55 PM
- Updated: 05:55 PM
नयी दिल्ली, 11 जून (भाषा) संतान के रूप में लड़के की चाहत करने संबंधी पितृसत्तात्मक सोच और बच्चे के जन्म से पहले 'चोरी छिपे' लिंग की जांच कराये जाने के चलन की निंदा करते हुए उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि जब तक मानसिकता में बदलाव नहीं आता, तब तक गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम का सख्ती से पालन किया जाना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि बालिकाओं के लिए ''बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, जननी सुरक्षा योजना, लाडली लक्ष्मी योजना'' जैसी कई योजनाएं इस बात का संकेत है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में लड़कियों के साथ होने वाले प्रणालीगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं।
पीठ ने कहा कि काफी प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बेहतर किये जाने की आवश्यकता है।
इसने कहा, ''पीसीपीएनडीटी अधिनियम जैसे कानूनों को सख्ती से लागू करना आवश्यक है। साथ ही तब तक निरंतर और गंभीर प्रयास भी जारी रहने चाहिए, जब तक समाज की मानसिकता में व्यापक बदलाव नहीं आ जाता।''
पीठ ने कहा, ''इसका यह मतलब नहीं है कि आईपीसी/बीएनएस जैसे अधिनियमों के तहत महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की अब आवश्यकता नहीं होगी, लेकिन कम से कम अब यह सवाल नहीं उठेगा कि क्या किसी बच्ची को जन्म लेने का हक है।''
जनगणना के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह दर्शाता है कि देश में बच्चों का लिंगानुपात 1991 में 945 से घटकर 2001 में 927 हो गया और आगे 2011 में 919 तक पहुंच गया, जो उस असंतुलन की गंभीरता को दर्शाता है, जिसके कारण पीसीपीएनडीटी अधिनियम को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता पड़ी।
पीठ ने कहा, ''इसके बावजूद, कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है। इससे पता चलता है कि बेटे की चाहत वाली पितृसत्तात्मक सोच अभी भी गहराई से मौजूद है और लिंग-जांच कराये जाने की प्रवृत्ति अभी भी चोरी-छिपे चल रही है।''
इसने कहा, ''वर्तमान स्थिति, चाहे वह अच्छी हो या फिर उसमें सुधार की गुंजाइश हो, केंद्र और राज्य सरकारों के निरंतर प्रयासों का नतीजा है। हम केवल यह देख सकते हैं कि अपना रास्ता तय करने के 75 साल से भी अधिक समय बाद, आज भी दिल्ली समेत किसी भी कस्बे या शहर में एक लड़की की शिक्षा और उत्थान के पोस्टर दिखना असामान्य बात नहीं है, जहां ये अक्सर दिल्ली परिवहन निगम की बसों पर सबसे अधिक दिखाई देते हैं।''
अपने फैसले में, पीठ ने सुभद्रा कुमारी चौहान की एक कविता 'बालिका का परिचय' का भी जिक्र किया, जिसमें अपनी बेटी के जन्म पर एक मां की जबरदस्त खुशी का वर्णन किया गया है।
शीर्ष अदालत ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'', जिसका अर्थ है कि जहां महिलाओं का सम्मान किया जाता है, वहां देवता निवास करते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने ये टिप्पणियां एक चिकित्सक द्वारा दायर उस अपील को खारिज करते हुए कीं, जिसमें गर्भ-धारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम के उल्लंघन से संबंधित, धारा 23 के तहत दंडनीय अपराधों के मामले में संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
भाषा
देवेंद्र माधव
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