भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अभी अल-नीनो की स्थितियां बनी हुई हैं: मौसम विभाग
माधव
- 12 Jun 2026, 08:31 PM
- Updated: 08:31 PM
नयी दिल्ली, 12 जून (भाषा) भूमध्य रेखा के समीप प्रशांत महासागर में फिलहाल अल नीनो की स्थितियां बन गई हैं तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इनके और अधिक मजबूत होने की संभावना है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
विभाग ने कहा कि समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि पर वायुमंडल ने प्रतिक्रिया दी है और महासागर-वायुमंडल की संयुक्त प्रणाली अब अल नीनो स्थितियों के अनुरूप विशेषताएं दिखा रही है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने कहा, '' 'मानसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम' (एमएमसीएफएस) के पूर्वानुमानों से संकेत मिलता है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अल नीनो की स्थितियां और मजबूत होंगी।''
इससे पहले अल नीनो की स्थितियां 2023 में विकसित हुई थीं। ये स्थितियां 2000 के बाद 2002, 2009 और 2015 में भी बनी थीं।
अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति है, जिसका असर दुनिया के मौसम और भारत के मानसून पर पड़ सकता है।
'अल नीनो दक्षिणी दोलन' (ईएनएसओ) के तीन चरणों में से एक है 'अल नीनो'। ईएनएसओ एक जलवायु संबंधी घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान में परिवर्तन होता है और ऊपरी वायुमंडल में भी उतार-चढ़ाव आते हैं।
जहां अल नीनो से पृथ्वी पर तापमान में वृद्धि होती है, वहीं इसका विपरीत चरण, जिसे 'ला नीना' कहा जाता है, आमतौर पर तापमान में कमी लाता है। ईएनएसओ का एक तटस्थ चरण भी होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो के कारण भारत में कम वर्षा होती है और इसके उभरने से इस वर्ष मानसून के मौसम में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने 29 मई को कहा कि इस मानसून में वर्षा का दीर्घकालिक औसत (एलपीए) लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है, जिसमें मॉडल त्रुटि चार प्रतिशत है।
एलपीए किसी विशेष क्षेत्र में एक निश्चित अवधि, जैसे कि एक महीना या एक मौसम, के दौरान दर्ज की गई वर्षा को दर्शाता है जिसका औसत आमतौर पर 30 से 50 वर्षों की लंबी अवधि के आधार पर निकाला जाता है।
1971 से 2020 तक के आंकड़ों के आधार पर भारत में मौसमी वर्षा का एलपीए 87 सेंटीमीटर है।
यदि मानसून के मौसम में एलपीए वर्षा के 90 प्रतिशत से कम वर्षा होती है, तो आईएमडी इसे 'अपर्याप्त' के रूप में वर्गीकृत करता है।
भारत में वार्षिक वर्षा का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मानसून के महीनों के दौरान प्राप्त होता है, जिससे यह मौसम कृषि, पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत उत्पादन और भूजल पुनर्भरण के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस वर्ष मानसून के आगमन में देरी हुई, क्योंकि केरल में इसका आगमन चार जून को हुआ। आमतौर पर इसका आगमन एक जून को होता है।
भाषा संतोष माधव
माधव
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