'लगान' का अनुभव अनोखा था, आज उसे दोहराना मुश्किल: रघुबीर यादव
शोभना
- 16 Jun 2026, 11:39 AM
- Updated: 11:39 AM
(बेदिका)
नयी दिल्ली, 16 जून (भाषा) अभिनेता रघुबीर यादव का कहना है कि गुजरात के भुज की भीषण गर्मी में बनी फिल्म 'लगान' की सफलता के पीछे कलाकारों और तकनीकी दल के बीच परिवार जैसा माहौल और सामूहिक भावना थी, जिसे आज के फिल्मी माहौल में दोहराना मुश्किल है।
फिल्म की रिलीज के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 'भाषा' को दिए एक साक्षात्कार में यादव ने कहा कि उन्होंने इससे पहले आमिर खान के साथ दीपा मेहता की 'अर्थ' में काम किया था। उसी दौरान आमिर ने उन्हें 'लगान' में भूरा की भूमिका की पेशकश की थी।
उन्होंने कहा, ''यह फिल्म बनाना अपने आप में एक अनोखा प्रयोग था। शुरुआत में इसकी शूटिंग तीन महीने में पूरी होनी थी, लेकिन कार्यक्रम दो महीने और बढ़ गया। हालांकि आमिर ने पूरी प्रक्रिया को जिस तरह संभाला, हमें समय बीतने का एहसास ही नहीं हुआ।''
यादव ने कहा कि 'लगान' थिएटर की भावना के साथ बनाई गई थी, जहां हर व्यक्ति फिल्म की सफलता के लिए खुद को जिम्मेदार मानता था।
उन्होंने कहा, ''हम सबमें एकता थी। हर कोई समझता था कि फिल्म को सफल बनाना उसकी जिम्मेदारी है। ऐसी प्रतिबद्धता और सोच हो तो परिणाम बेहतर ही होता है। आज फिल्मों में ऐसा माहौल बन पाना मुश्किल है। अगर ऐसा होता तो और भी कई क्लासिक फिल्में बनतीं।''
उन्होंने कहा कि काबुलीवाला, दो बीघा ज़मीन और मदर इंडिया जैसी फिल्मों का निर्माण भी इसी सामूहिक भावना से हुआ था, इसलिए वे आज भी ताजा महसूस होती हैं।
यादव ने फिल्म के सेट पर परिवार जैसा वातावरण बनाने का श्रेय आमिर खान को दिया। उन्होंने कहा, '''लगान' में हर किसी को लगता था कि यह उसकी अपनी फिल्म है और इसका श्रेय आमिर को जाता है। अगर वह किसी बड़े सितारे की तरह अलग रहते, तो यह संभव नहीं हो पाता। सेट पर वह हम सबकी तरह ही थे। धूप में लगातार रहने के कारण उनका रंग भी कुछ सांवला हो गया था।''
अभिनेता ने 'लगान' की शूटिंग से जुड़ी यादें साझा करते हुए कहा बताया कि पूरी टीम एक ही जगह पर रहती थी, जिससे सभी के बीच पारिवारिक संबंध बन गए थे। उन्होंने कहा कि शनिवार को सभी कलाकार और तकनीशियन, जिनमें आमिर खान भी शामिल थे, भत्ते के लिए कतार में खड़े होते थे और रविवार को अवकाश मिलता था।
उन्होंने हंसते हुए कहा, ''शूटिंग स्थल के लिए बस सुबह चार बजे निकलती थी और किसी को देर करने की अनुमति नहीं थी। एक बार आमिर खुद देर से पहुंचे तो बस निकल चुकी थी।''
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित यादव ने कहा कि थिएटर पृष्ठभूमि वाले कलाकारों के लिए टीम के रूप में काम करना सहज था। उनके अनुसार, सेट पर सभी के लिए एक जैसे नियम थे, चाहे वह रघुबीर यादव हों, आमिर खान हों या यशपाल शर्मा।
मध्य प्रदेश के एक गांव में पले-बढ़े यादव ने कहा कि भूरा का किरदार निभाना उनके लिए कठिन नहीं था क्योंकि ग्रामीण जीवन का उनका निजी अनुभव इस भूमिका में काम आया। उन्होंने कहा, ''इस फिल्म के जरिए मुझे अपना बचपन फिर से जीने का अवसर मिला। मैं गांव में पला-बढ़ा हूं और भैंसें चराने खेतों तक ले जाता था।''
क्रिकेट सीखने के बारे में यादव ने कहा कि बचपन में खेले जाने वाले पारंपरिक खेल 'गिल्ली-डंडा' ने उन्हें फिल्म के लिए जरूरी कौशल सीखने में मदद की।
उन्होंने यह भी बताया कि शूटिंग के दौरान हर रविवार भारतीय और ब्रिटिश कलाकारों के बीच क्रिकेट मैच होते थे और भारतीय टीम अक्सर अपने प्रतिद्वंद्वियों का ध्यान भटकाकर जीत जाती थी।
शूटिंग के दौरान भोजन विषाक्तता और अपेंडिक्स के ऑपरेशन का सामना करने के बावजूद यादव ने कहा कि उन्हें उन पांच महीनों की सबसे ज्यादा याद वहां बिताए गए आनंदमय पल आते हैं।
उन्होंने कहा, ''मुझे अपेंडिक्स का ऑपरेशन कराना पड़ा था और बीच ऑपरेशन में मेरी आंख खुल गई थी। मुझे काफी दर्द था, लेकिन आमिर ने मेरी बहुत देखभाल की।''
हाल ही में फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग देखने वाले 68 वर्षीय अभिनेता ने कहा कि इससे पुरानी यादें ताजा हो गईं।
उन्होंने कहा, ''ऐसा नहीं लगा कि 25 साल बीत गए हैं। इस तरह की फिल्में कालजयी होती हैं। कई फिल्में एक-दो बार देखी जाती हैं और फिर भुला दी जाती हैं, लेकिन 'लगान' हमेशा हमारे इतिहास का हिस्सा बनी रहेगी।''
भाषा मनीषा शोभना
शोभना
1606 1139 दिल्ली