गर्भ ग्रीवा के कैंसर की जांच के लिए स्वदेशी एचपीवी टेस्ट किफायती विकल्प के रूप में उभरा
मनीषा
- 16 Jun 2026, 05:03 PM
- Updated: 05:03 PM
(पायल बनर्जी)
नयी दिल्ली, 15 जून (भाषा) गर्भ ग्रीवा के कैंसर की जांच में एक स्वदेशी 'प्वाइंट-ऑफ-केयर' एचपीवी टेस्ट बेहद किफायती और असरदार साधन के रूप में उभरा है। कई देशों में अलग-अलग आबादी पर किए गए अध्ययन में यह जांच न सिर्फ प्रदर्शन के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरी है, बल्कि इसने सीमित संसाधनों वाले इलाकों में बीमारी का जल्दी पता लगाने की कवायद में तेजी लाने की भी उम्मीद जगाई है।
'प्वाइंट-ऑफ-केयर' से आशय ऐसी जांच विधि से है, जिसके तहत मरीज के पास जाकर नमूने एकत्र किए जा सकते हैं और उन्हें किसी प्रयोगशाला में भेजने के बजाय उसी जगह पर जांच कर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं।
जून में 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर' में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि 'ट्रूनैट एचआर-एचपीवी-प्लस' जांच 'कैंसर पर अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसी' (आईएआरसी) के 'रिड्यूस्ड-वैलेंसी' और 'नॉन-इनफीरियरिटी' प्रमाणन के सभी मानदंडों पर खरी उतरती है और इस तरह यह एचपीवी के सात से आठ उच्च जोखिम वाले स्वरूपों की पुष्टि में कारगर पहली औपचारिक रूप से प्रमाणित 'रिड्यूस्ड-वैलेंसी' एपीवी जांच बन गई है।
'रिड्यूस्ड-वैलेंसी' और 'नॉन-इनफीरियरिटी' आईएआरसी की ओर से उन एचपीवी जांच का मूल्यांकन करने के लिए निर्धारित दिशा-निर्देश हैं, जो इस वायरस के उच्च जोखिम वाले पारंपरिक 14 स्वरूपों के बजाय गर्भ ग्रीवा के कैंसर का सबसे ज्यादा खतरा पैदा करने वाले सात-आठ स्वरूपों पर केंद्रित होते हैं। इनका उद्देश्य जांच क्षमता में सुधार करना और लागत में कमी लाना है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, गर्भ ग्रीवा के कैंसर के खतरे के प्रति आगाह करने वाली स्थिति 'सर्विकल इंट्राएपिथीलियल नियोप्लासिया ग्रेड 2' का पता लगाने में इस जांच की 'सेंसिटिविटी' (किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों की सटीक पहचान करने की क्षमता) 80.4 फीसदी और 'स्पेसिफिसिटी' (ऐसे व्यक्तियों की सटीक पहचान करने की क्षमता, जो बीमारी से पीड़ित नहीं हैं) 91.5 प्रतिशत दर्ज की गई।
उन्होंने बताया कि इस जांच का 'इंटर-लैबोरेटरी एग्रीमेंट' (जांच किट से नमूनों की जांच के अलावा उन्हें अलग-अलग प्रयोगशाला में भेजकर निष्कर्षों का मिलान करने की प्रक्रिया) भी 93.3 फीसदी पाया गया।
अध्ययन दल में शामिल राष्ट्रीय कैंसर संस्थान, एम्स (झज्जर) की प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. नीरजा भाटला ने कहा, "गर्भ ग्रीवा का कैंसर उन कुछ कैंसर में से एक है, जिनके कारण हमें पता हैं, जिनसे बचाव के तरीके मौजूद हैं और जिनके जोखिम का अंदाजा शुरुआती स्टेज में ही लगाया जा सकता है। फिर भी भारत में हजारों महिलाओं में इस बीमारी का पता देर से चलता है, क्योंकि उन्हें सही समय और सही जगह पर जांच सुविधा नहीं उपलब्ध कराई जा पाती है।"
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली में स्त्री एवं प्रसूती रोग विभाग की प्रमुख रह चुकी डॉ. भाटला ने कहा कि 30 साल से ज्यादा उम्र की कई महिलाओं में गर्भ ग्रीवा के कैंसर का खतरा कम करने के लिए सबसे अहम रणनीति जांच सुविधाओं का विस्तार है।
उन्होंने कहा, "हमें ऐसी मजबूत जांच प्रणाली की जरूरत है, जो कैंसर होने से पहले ही उसके जोखिम के प्रति संवेदनशील महिलाओं की पहचान कर सकें। इस दिशा में एचपीवी डीएनए जांच बेहद अहम साबित हो सकती है।"
शोधकर्ताओं के अनुसार, स्वदेशी एचपीवी जांच की उच्च 'स्पेसिफिसिटी' दर उसे बेहद विश्वसनीय और किफायती बनाती है, क्योंकि इससे महिलाओं को अनावश्यक रूप से रेफर किए जाने और आगे कोई अन्य जांच कराने की जरूरत घट जाती है।
गर्भ ग्रीवा का कैंसर भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। देश में हर साल इसके अनुमानित 1,27,000 नये मामले सामने आते हैं और लगभग 80,000 मरीजों की मौत हो जाती है।
भाषा
पारुल मनीषा
मनीषा
1606 1703 दिल्ली