तृणमूल बागियों की एनसीपीआई में विलय की योजना की 2016 में खांडू के नेतृत्व में कांग्रेस में हुई टूट से समानता
शफीक
- 16 Jun 2026, 06:57 PM
- Updated: 06:57 PM
नयी दिल्ली, 16 जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी लोकसभा सदस्यों का एक अपेक्षाकृत कम ज्ञात गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी में विलय की योजना की 2016 में अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस इकाई में हुए विभाजन से "चौंकाने वाली समानताएं" हैं, जिसका नेतृत्व पेमा खांडू ने किया था। यह बात निर्वाचन आयोग के पूर्व अधिकारियों ने कही है।
वर्ष 2016 में अरुणाचल प्रदेश में पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राजनीतिक पुनर्गठन में से एक देखा गया था। उस वर्ष सितंबर में खांडू और कांग्रेस के 42 विधायकों ने पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (पीपीए) का दामन थाम लिया था, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी कांग्रेस के साथ बने रहे थे।
तब भाजपा नीत 'नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस' (एनईडीए) का हिस्सा रही पीपीए ने खांडू के नेतृत्व में सरकार बनाई थी।
इसके दो महीने बाद, दिसंबर में खांडू और पीपीए के 32 विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया था। इस कदम से भाजपा को अरुणाचल प्रदेश में पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार मिल गई थी और 60 सदस्यीय विधानसभा में उसकी संख्या बढ़कर 45 हो गई थी। वहीं पीपीए 10 और कांग्रेस तीन विधायकों तक सिमट गई थी।
वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 60 में से 41 सीट जीतीं और खांडू मुख्यमंत्री बने रहे।
वहीं, 2026 की बात करें तो तृणमूल कांग्रेस के 20 असंतुष्ट लोकसभा सदस्यों के एक समूह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को बताया है कि वे एक पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में विलय की योजना बना रहे हैं जिसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है।
वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने चार उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से दो ने पार्टी के चुनाव चिन्ह पर जबकि एक ने निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा था। वहीं चौथे का नामांकन खारिज हो गया था। तीनों उम्मीदवार हार गए थे और उन्हें 'नोटा' के बराबर या उससे कम वोट मिले थे।
सूत्रों ने बताया कि लोकसभा सचिवालय अब तृणमूल कांग्रेस के बागियों के विलय प्रस्ताव पर लिखित कानूनी राय मांग रहा है, ताकि अदालत में चुनौती दिये जाने की स्थिति में अध्यक्ष का अंतिम निर्णय न्यायिक समीक्षा में टिक सके।
पूर्व लोकसभा महासचिव एवं संवैधानिक विशेषज्ञ पी डी टी आचारी ने संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 4 का हवाला देते हुए कहा कि केवल एक राजनीतिक दल ही किसी अन्य दल में विलय कर सकता है और केवल सांसद या विधायक किसी अन्य दल में विलय नहीं कर सकते।
दसवीं अनुसूची के पैरा 4 में विलय की स्थिति में पद से अयोग्यता से छूट के प्रावधान का उल्लेख है।
इसमें कहा गया है कि यदि किसी सदस्य का मूल राजनीतिक दल किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय कर लेता है और संबंधित विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य ऐसे विलय पर सहमत होते हैं, तो ऐसे सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
आचारी ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा कि यदि किसी राजनीतिक दल का नेतृत्व किसी अन्य दल में विलय का निर्णय लेता है, तो उसके सांसदों और विधायकों को इसे स्वीकार करना होगा, ''लेकिन केवल सांसद या विधायक किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय नहीं कर सकते… यह संवैधानिक प्रावधान है।''
निर्वाचन आयोग में राजनीतिक दलों से जुड़े मामलों को देखने वाले आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने तृणमूल के बागियों की एनसीपीआई में विलय योजना को "एक नवाचार" बताया, जिसका उल्लेख ना तो दलबदल रोधी कानून में है और ना ही जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में है।
तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर बागी सांसदों के विलय प्रस्ताव पर पहले ही आपत्ति जता चुके हैं।
दस जून के पत्र में उन्होंने महाराष्ट्र राजनीतिक संकट पर उच्चतम न्यायालय के संविधान पीठ के 2023 के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि एक राजनीतिक दल और विधायी दल अलग-अलग इकाई हैं तथा पैरा 4 के तहत सुरक्षा के लिए मूल राजनीतिक दल का वैध विलय आवश्यक है।
भाषा अमित शफीक
शफीक
1606 1857 दिल्ली