बिरला से मिलने के बाद अभिषेक बनर्जी ने कहा: बागी सांसदों को अयोग्य ठहराने के लिए 20 याचिकाएं दी गईं
हक
- 19 Jun 2026, 06:59 PM
- Updated: 06:59 PM
नयी दिल्ली, 19 जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने शुक्रवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर पार्टी के 20 बागी सांसदों के खिलाफ 20 याचिकाएं सौंपीं और उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की।
लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद संवाददाताओं से बातचीत में बनर्जी ने कहा कि इन सांसदों ने 'नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में शामिल होने का दावा किया है और पार्टी छोड़ने के आधार पर इन सांसदों को सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
बनर्जी ने कहा, "20 लोगों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और खुद को एक अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की। बाद में हमें पता चला कि इन सांसदों ने एनसीपीआई नाम की दूसरी पार्टी में शामिल होने का दावा किया है। किसी ने इस पार्टी का नाम नहीं सुना था। यहां तक कि इन सांसदों ने भी पहले इसका नाम नहीं सुना था।"
उन्होंने कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची में यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है, तो वह सांसद के रूप में अयोग्य हो जाता है।
उन्होंने कहा, "यदि कोई व्यक्ति किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीतता है और दो साल बाद कहता है कि वह दूसरी पार्टी में शामिल हो रहा है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जानी चाहिए।"
बनर्जी ने कहा कि किसी दूसरी पार्टी में विलय के लिए दो-तिहाई सदस्यों का नियम पूरी पार्टी पर लागू होता है, केवल संसदीय दल पर नहीं।
उन्होंने कहा, "इसी आधार पर मैंने तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा नेता के रूप में इन 20 सांसदों के खिलाफ अलग-अलग 20 अयोग्यता याचिकाएं दी हैं।"
लोकसभा अध्यक्ष ने इन 20 बागी तृणमूल कांग्रेस सांसदों की मांग पर फैसला लेने से पहले बनर्जी को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया था।
इन सांसदों ने एनसीपीआई में विलय के बाद खुद को अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की है।
बनर्जी ने पिछले सप्ताह भी लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा था।
उन्होंने आग्रह किया था कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर अलग गुट होने का दावा करने वाले किसी भी समूह को कोई मान्यता, दर्जा या सुविधा न दी जाए।
उन्होंने कहा था कि संविधान और दल-बदल विरोधी कानून किसी मौजूदा राजनीतिक दल के भीतर अलग समूह बनाने की अनुमति नहीं देते।
भाषा जोहेब हक
हक
1906 1859 दिल्ली