पासपोर्ट-नागरिकता विवाद: सरकार बोली-पिछले 12 वर्षों में कोई नया फैसला नहीं लिया गया; विपक्ष हमलावर
शफीक
- 25 Jun 2026, 10:27 PM
- Updated: 10:27 PM
नयी दिल्ली, 25 जून (भाषा) पासपोर्ट के नागरिकता का सबूत न होने के विदेश मंत्रालय के बयान पर बृहस्पतिवार को बड़ा विवाद खड़ा हो गया। एक तरफ जहां सरकार ने दावा किया कि पासपोर्ट कभी नागरिकता का सबूत नहीं रहा है और नरेन्द्र मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में इस दस्तावेज को लेकर कोई नया फैसला नहीं लिया है।
वहीं, दूसरी ओर विपक्ष ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल से वैचारिक और राजनीतिक असहमति रखने वाले लोगों को मनमाने ढंग से नागरिकता के अधिकार से वंचित करने की जमीन तैयार की जा रही है।
सरकारी सूत्रों ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 का हवाला देते हुए कहा कि "जनहित" में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट दिया जा सकता है, जबकि निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के लिए अपनी पात्रता साबित करने के वास्ते मतदाताओं को जिन 12 वैध सहायक दस्तावेजों की जरूरत होती है, उनमें पासपोर्ट अब भी शामिल है।
विवाद के बीच विदेश मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को एक गजट अधिसूचना जारी की, जिसमें 36 पन्नों के नये सामान्य पासपोर्ट के लिए आवेदन शुल्क 1,500 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये किए जाने की घोषणा की गई है।
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब मीडिया में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से खबर आई कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का सबूत। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने बुधवार को कहा था कि पासपोर्ट किसी व्यक्ति की नागरिकता साबित करने वाला दस्तावेज नहीं है।
एक सरकारी सूत्र ने कहा, "यह कल तय नहीं किया गया कि पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है। पिछले 12 वर्षों में भी ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया। पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं रहा है।"
सूत्रों ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा-20 का भी हवाला दिया, जिसके अनुसार उन लोगों को भी भारतीय पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज जारी किए जा सकते हैं, जो भारत के नागरिक नहीं हैं।
हालांकि, उन्होंने इस अधिनियम की धारा-6(2)(ए) का भी जिक्र किया, जो यह प्रावधान करती है कि "अगर आवेदक भारत का नागरिक नहीं है", तो पासपोर्ट प्राधिकरण उसे पासपोर्ट जारी करने से इनकार कर देगा।
विपक्षी दल कांग्रेस ने विदेश मंत्रालय के बयान की आलोचना की। पार्टी ने आरोप लगाया कि उन भारतीयों के नागरिक अधिकारों को मनमाने ढंग से नकारने की जमीन तैयार कर रही है, जिनसे उसकी वैचारिक या राजनीतिक असहमति है।
कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत केंद्र सरकार ने पहले अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए कुछ समुदायों के लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए थे।
वेणुगोपाल ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, "यह सरकार आम नागरिकों के बीच भय का माहौल पैदा करने में माहिर है। यह कहकर कि पासपोर्ट भी किसी व्यक्ति की नागरिकता का प्रमाण नहीं है, वह उन भारतीयों के नागरिक अधिकारों को मनमाने ढंग से नकारने की जमीन तैयार कर रही है, जिनसे उसकी वैचारिक या राजनीतिक असहमति है।"
हालांकि, भाजपा ने विदेश मंत्रालय के बयान का बचाव किया और कहा कि मोदी सरकार ने पासपोर्ट को लेकर कोई नया नियम लागू नहीं किया है। पार्टी ने कहा कि विदेश मंत्रालय ने बस पहले से तय कानूनी स्थिति को दोहराया है कि पासपोर्ट अकेले भारतीय नागरिकता का पुख्ता सबूत नहीं है।
भाजपा ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और बंबई उच्च न्यायालय के 2013 के फैसले समेत कई अदालती आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकता, नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत तय होती है, न कि किसी एक दस्तावेज के आधार पर।
भाजपा के आईटी प्रकोष्ठ के प्रमुख अमित मालवीय ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए उसके नेताओं को "कागज नहीं दिखाएंगे ब्रिगेड" करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता राजनीतिक कारणों से एक तय कानूनी स्थिति को लेकर सनसनी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
उधर, निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने कहा कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान अपनी पात्रता साबित करने के वास्ते मतदाताओं को जिन 12 मान्य सहायक दस्तावेजों की जरूरत होती है, उनमें भारतीय पासपोर्ट अब भी शामिल है।
बिहार में एसआईआर, असम में विशेष पुनरीक्षण और मतदाता सूची में सुधार के बाद के चरणों के दौरान पासपोर्ट को लगातार उन 12 दस्तावेजों में से एक के तौर पर शामिल किया गया है, जिन्हें लोग मतदाता सूची में अपना नाम बनाए रखने या पंजीकृत कराने के लिए पेश कर सकते हैं।
निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी ने कहा, "पासपोर्ट पहचान साबित करने वाले दस्तावेजों में शामिल था और अब भी है। इस नियम में कोई बदलाव नहीं हुआ है।"
मतदाता पंजीकरण अधिकारी यह तय करने के लिए कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने के लिए पात्र है या नहीं, जरूरी दस्तावेजों में से किसी एक की जांच करता है।
एसआईआर पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आधार नागरिकता का पुख्ता सबूत नहीं है, बल्कि यह सिर्फ पहचान संबंधी दस्तावेज है।
भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने 20 दिसंबर 2019 को राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवालों (एफएक्यू) के जरिये विस्तृत जानकारी प्रदान की थी।
इसमें कहा गया था, "जन्म की तारीख और जन्मस्थान से जुड़े कोई भी दस्तावेज जमा करके नागरिकता साबित की जा सकती है। हालांकि, ऐसे स्वीकार्य दस्तावेजों पर अभी फैसला लिया जाना बाकी है।"
पीआईबी ने 'एफएक्यू' में यह भी कहा था कि किसी भी व्यक्ति की नागरिकता का फैसला नागरिकता नियम, 2009 के आधार पर किया जाता है और ये नियम नागरिकता अधिनियम, 1955 पर आधारित हैं।
उसने कहा था कि किसी भी व्यक्ति के भारत का नागरिक बनने के पांच तरीके हैं : जन्म से नागरिकता, वंश के आधार पर नागरिकता, पंजीकरण से नागरिकता, नैचुरलाइजेशन (देशीयकरण) के जरिये नागरिकता और इनकॉर्पोरेशन (क्षेत्र के विलय) के जरिये नागरिकता।
तृणमूल कांग्रेस नेता महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे पर सरकार पर तंज कसा।
उन्होंने 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, "ऐसा लगता है कि आज भारतीय नागरिकता का एकमात्र सबूत हिंदू और भाजपा का मतदाता होना है। इसके अलावा और कुछ नहीं चलेगा।"
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पूछा कि अगर पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड और मतदाता पहचानपत्र नागरिकता संबंधी दस्तावेज नहीं हैं, तो नागरिकता साबित करने के लिए कौन-सा दस्तावेज जरूरी है।
उन्होंने कहा, "सरकार के मुताबिक, कोई भी दस्तावेज नागरिकता का पुख्ता सबूत नहीं है। 2030 तक नागरिकता का सबूत सिर्फ एक ही दस्तावेज होगा : भाजपा की सदस्यता।"
राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने भी इस मामले पर सरकार पर निशाना साधा।
उन्होंने 'एक्स' पर लिखा, "तो फिर कौन-सा दस्तावेज नागरिकता का सबूत है? बीएलओ (बूथ-स्तरीय अधिकारी) मेरी नागरिकता पर शक कर सकता है, मुझे वोट देने से रोक सकता है। नतीजा : भाजपा चुनाव जीत जाती है।"
गीतकार जावेद अख्तर ने विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण को "बेतुका" करार दिया।
उन्होंने 'एक्स' पर पोस्ट किया, "विदेश मंत्रालय का कहना है कि पासपोर्ट यात्रा संबंधी दस्तावेज है, नागरिकता का सबूत नहीं। सच में? तो क्या वे कुछ लोगों को यह यात्रा दस्तावेज पूरी तरह आश्वस्त हुए बिना दे रहे हैं कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं।"
भाषा पारुल शफीक
शफीक
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