भारत ने कूलिंग को ऊर्जा नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य और जलवायु रणनीति का हिस्सा बनाया: रिपोर्ट
वैभव
- 30 Jun 2026, 11:08 AM
- Updated: 11:08 AM
(अपर्णा बोस)
नयी दिल्ली, 30 जून (भाषा) भारत ने बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी से निपटने के लिए 'इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान' (आईसीएपी) के तहत कूलिंग (शीतलन) को केवल ऊर्जा की बढ़ती मांग का मुद्दा नहीं माना, बल्कि सुरक्षित और ऊर्जा-सक्षम कूलिंग तक लोगों की पहुंच को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता के रूप में जलवायु परिवर्तन को कम करने और अनुकूलन के लक्ष्यों से जोड़ा है।
संयुक्त राष्ट्र (संरा) की एक संस्था की ओर से मंगलवार को जारी रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।
'एशिया-पैसिफिक सिनर्जीज रिपोर्ट: एडवांसिंग सिनर्जिस्टिक सॉल्यूशंस टू द ट्रिपल प्लैनेटरी क्राइसिस एंड द एसडीजी' शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि कूलिंग को स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करने से इस क्षेत्र को राजनीतिक समर्थन मिला है। साथ ही ऊर्जा, शहरी विकास, श्रम और सामाजिक क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने में भी मदद मिली है।
एशिया और प्रशांत के लिए आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (ईएससीएपी) की रिपोर्ट में कहा गया, "यदि सावधानीपूर्वक प्रबंधन नहीं किया गया तो एयर कंडीशनिंग का विस्तार उच्च उत्सर्जन को बढ़ावा देने, वायु प्रदूषण गंभीर होने और ऊर्जा निर्धनता को बढ़ाने का जोखिम पैदा करता है।''
'ऊर्जा निर्धनता' से आशय ऐसी स्थिति से है जब किसी व्यक्ति या परिवार के पास अपनी बुनियादी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त, विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती।
रिपोर्ट के अनुसार, इन चुनौतियों से निपटने के लिए बनाई गई नीतियां राष्ट्रीय स्तर की हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन राज्यों और शहरों में चलाए जा रहे कार्यक्रमों तथा प्रायोगिक परियोजनाओं के जरिए हो रहा है। इसकी वजह यह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में जलवायु जोखिम, बिजली व्यवस्था और कूलिंग की जरूरतें अलग-अलग हैं।
इसमें कहा गया, "बढ़ते तापमान और अत्यधिक गर्मी से निपटने की प्रतिक्रिया में भारत ने सतत कूलिंग से जुड़ी कई पहलें आगे बढ़ाई हैं। इनमें एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज लिमिटेड (ईईएसएल) के माध्यम से संचालित कार्यक्रम और भारत कूलिंग एक्शन प्लान (आईसीएपी) के तहत समर्थित पहलें शामिल हैं। इनका क्रियान्वयन कई राज्यों और शहरों में कार्यक्रमों तथा प्रायोगिक परियोजनाओं के जरिए किया जा रहा है।"
रिपोर्ट में प्रकृति के अनुकूल विकास मॉडल के जरिए जैव विविधता संरक्षण को भी अहम बताया गया है। इसमें कहा गया है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब ऐसा सक्षम वातावरण तैयार किया जाए, जो एकीकृत, व्यापक और परिवर्तनकारी प्रयासों को बढ़ावा दे।
इसमें कहा गया, "समन्वित (सिनर्जिस्टिक) दृष्टिकोण जैव विविधता और अन्य पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने का परिवर्तनकारी तरीका साबित हो सकते हैं। इसकी वजह यह है कि जैव विविधता कोई अलग पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सतत, समावेशी और लचीले विकास की बुनियाद है।"
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के समन्वित दृष्टिकोण को व्यवहार में उतारने के लिए व्यापक योजना और विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय जरूरी है। इसी संदर्भ में दक्षिण भारत की कलरायन पहाड़ियों में पवित्र वनों (सेक्रेड ग्रोव्स) के पुनर्जीवन के लिए चल रही सतोयामा पहल का उल्लेख किया गया है। इस परियोजना को वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (वीआईटी) ने 'सतोयामा डेवलपमेंट मैकेनिज्म फंड' के सहयोग से लागू किया है।
रिपोर्ट में भारत की राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (एनएपीसीसी) के तहत संचालित राष्ट्रीय हरित भारत मिशन का भी उल्लेख किया गया है। इसमें वन पुनर्स्थापन को ग्रामीण विकास, ऊर्जा और जल संरक्षण कार्यक्रमों के साथ जोड़ा गया है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को हर साल लगभग 800 अरब अमेरिकी डॉलर की जलवायु वित्तीय कमी का सामना करना पड़ रहा है।
फिजी, भारत, इंडोनेशिया और वियतनाम के उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि संभावित चुनौतियों को पहले से समझकर उनका प्रभावी प्रबंधन किया जाए, तो समन्वित वित्तपोषण पूरी तरह व्यवहारिक है।
इन देशों के अनुभव बताते हैं कि निवेश योग्य समन्वित परियोजनाओं की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। इसके लिए ऐसा अनुकूल माहौल, स्वैच्छिक ढांचा और वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा, जिससे निजी क्षेत्र इन परियोजनाओं में निवेश के लिए आगे आए।
रिपोर्ट में देश की सरकारों से मंत्रालयों के बीच समन्वय को संस्थागत रूप देने की सिफारिश की गई है। इसके लिए ऐसे सचिवालय बनाने की बात कही गई है, जिन्हें जलवायु, जैव विविधता और प्रदूषण के मानकों के आधार पर सार्वजनिक निवेश की समीक्षा करने का अधिकार हो।
भाषा खारी वैभव
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