पर्यावरणविदों ने दिल्ली रिज में चट्टान पर रहस्यमयी आकृतियों का पता लगाया, विस्तृत अध्ययन की मांग
नरेश
- 01 Jul 2026, 10:07 PM
- Updated: 10:07 PM
नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) दो पर्यावरणविदों द्वारा दिल्ली के सेंट्रल रिज की जैव विविधता का दस्तावेजीकरण करने के दौरान पोलो ग्राउंड के पास स्थित एक क्वार्ट्जाइट चट्टान पर उकेरी गई आकृतियां मिली। विशेषज्ञों का कहना है कि उनका काल और महत्व निर्धारित करने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।
पर्यावरणविद् प्रदीप कृष्ण और चेतन अग्रवाल ने रिज के अपने नियमित दौरों के दौरान इन आकृतियों को देखा; वे आम तौर पर वहां इलाके की समृद्ध जैव-विविधता और पेड़-पौधों का दस्तावेजीकरण करते हैं।
कृष्ण ने बताया कि वे दोनों पहले भी कई बार उस जगह जा चुके थे, लेकिन हाल ही में एक दौरे के दौरान अग्रवाल की नजर पोलो ग्राउंड के पास जमीन से बाहर निकले एक बड़े क्वार्टजाइट पत्थर पर बने अजीब निशानों पर पड़ी।
उन्होंने कहा, "यह खोज अपने आप में एक इत्तेफाक थी। हम वहां रिज की जैव-विविधता का अध्ययन करने गए थे, न कि पुरातत्व से जुड़ी चीजें खोजने। चेतन की नजर उन आकृतियों पर पड़ी, जिसने हमारी दिलचस्पी बढ़ाई। बाद में हम एक इतिहासकार दोस्त को साथ ले गए, जिन्होंने सुझाव दिया कि ये शायद 'पेट्रोग्लिफ' (चट्टानों पर उकेरी गई आकृतियां) हो सकती हैं।"
'पेट्रोग्लिफ' चट्टानों की सतह पर उकेरी या खरोंचकर बनाई गई प्राचीन प्रतीकात्मक आकृतियां या चित्र हैं।
कृष्ण ने कहा कि वे 'पेट्रोग्लिफ' के विशेषज्ञ नहीं हैं और इसलिए इसके काल के बारे में कोई अंदाजा नहीं लगा सकते।
उन्होंने कहा कि यह बताना मुश्किल है कि 'पेट्रोग्लिफ' असल में कितने पुराने हैं। उन्होंने कहा, "हो सकता है कि वे एक हजार साल, 500 साल, 200 साल या सिर्फ एक साल पुराने हों। लेकिन कम से कम हमें यह पता है कि वे उस शिलालेख से नए नहीं हैं।"
उन्होंने कहा कि ये नक्काशी सेंट्रल रिज में पोलो ग्राउंड के पास जमीन से बाहर निकले एक बड़े क्वार्ट्जाइट पत्थर पर बनी हुई है।
जानकारों का कहना है कि भले ही ये नक्काशी प्राचीन हो सकती है, लेकिन उन्होंने वैज्ञानिक जांच के बिना इनके काल या ऐतिहासिक महत्व देने के मामले में सावधानी बरतने की सलाह दी है।
पुरातत्वविद् डॉ. संजीव कुमार सिंह ने कहा, "अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, इसलिए यहां चट्टानों पर आकृतियां मिलना कोई असामान्य बात नहीं है। हरियाणा सरकार और डॉ. ए. के. शर्मा समेत कई शोधकर्ताओं ने पहले भी ऐसी आकृतियों के बारे में जानकारी दी है।"
उन्होंने कहा कि इस चरण में ये कलाकृतियां अकादमिक चर्चा का विषय हैं। हालांकि ये महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन बिना सही सबूत के इनके काल या उत्पत्ति के बारे में कोई भी अंदाजा लगाना जल्दबाजी होगी।
भाषा
शुभम नरेश
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