एबीसी करेगा पत्रकारिता में एआई के उपयोग का परीक्षण, जानिए इसके लाभ और चुनौतियां
सुरेश
- 07 Jul 2026, 03:16 PM
- Updated: 03:16 PM
(टिमोथी कोस्की, सिडनी विश्वविद्यालय)
सिडनी, सात जुलाई (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया के सार्वजनिक प्रसारक एबीसी ने समाचार तैयार करने में सृजनात्मक कृत्रिम मेधा (जेनरेटिव एआई) के इस्तेमाल को लेकर मंगलवार को अपने रुख में बदलाव के संकेत दिए। पहले जहां वह इस तकनीक को लेकर सतर्कता बरत रहा था, वहीं अब अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनी एंथ्रोपिक के साथ हुए हालिया समझौते के बाद एबीसी के कर्मचारियों के लिए समाचार जारी करने में 'क्लॉड एआई' का उपयोग करने का रास्ता खुल गया है।
फिलहाल, एआई के इस्तेमाल का दायरा सीमित रखा गया है और इसका मुख्य उद्देश्य रेडियो कार्यक्रमों को समाचार लेखों में बदलना है। हालांकि, एबीसी ने संकेत दिए हैं कि भविष्य में इसका दायरा बढ़ाकर अन्य कार्यों में भी एआई का उपयोग किया जा सकता है। प्रसारक एआई अपनाने की प्रक्रिया में सहायता के लिए विशेषज्ञों की भी नियुक्ति करेगा।
इस पहल का उद्देश्य कर्मचारियों को नियमित कार्यों से राहत देकर उन्हें खोजी पत्रकारिता जैसे मूल कार्यों के लिए अधिक समय उपलब्ध कराना है। साथ ही, इससे एबीसी की समाचार गुणवत्ता बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
ऑस्ट्रेलिया में एआई टूल को लेकर लोगों के बीच एक अलग तरह का अविश्वास है। ऐसे में यह देखना होगा कि आम जनता इस बदलाव को किस तरह स्वीकार करती है। दूसरी ओर, यह फैसला उस लंबे इतिहास के अनुरूप भी है, जिसमें संपादक और पत्रकार नयी तकनीकों को सबसे पहले अपनाने वालों में शामिल रहे हैं।
पत्रकार पहले से ही विभिन्न डेटा टूल का इस्तेमाल करते हैं। वहीं, जेनरेटिव एआई का उपयोग पत्रकारिता को अधिक प्रभावी बनाने के लिए ऐसे नए और अभूतपूर्व तरीकों से भी किया जा सकता है, जो अबतक संभव नहीं थे।
हालांकि, यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब पत्रकारिता पहले से ही समाचार संस्थानों और पत्रकारों के अस्तित्व से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। एआई इन समस्याओं को दूर भी कर सकता है तथा उतनी ही आसानी से उन्हें और गंभीर भी बना सकता है।
तकनीक को सबसे पहले अपनाने वाले?
पत्रकार और समाचार निर्माता लंबे समय से ऐसे प्रौद्योगिकी नवाचारों में विशेष रुचि रखते रहे हैं, जो उनकी व्यस्त कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बना सकें। साथ ही, अत्याधुनिक टूल और नयी प्रौद्योगिकियों को जानने-समझने के प्रति उनमें हमेशा गहरी जिज्ञासा भी रही है।
चैटबॉट के रूप में जेनरेटिव एआई ने पिछले केवल तीन वर्षों में ही सुर्खियां बटोरी हैं, लेकिन पत्रकार एक दशक से भी अधिक समय से स्वचालित प्रणालियों और 'रोबो-राइटिंग' का उपयोग कर आंकड़ों को सरल समाचारों में बदलकर अपने काम को आसान बनाते रहे हैं। वर्ष 2016 के एक अध्ययन में तो पाठकों ने कंप्यूटर द्वारा तैयार लेखों को ''अधिक विश्वसनीय'' और ''पत्रकारिता की दृष्टि से अधिक विशेषज्ञता वाला'' माना था।
हालांकि, प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाने के साथ यह चिंता भी बढ़ी है कि कुछ नवाचार लाभ पहुंचाने के बजाय अधिक व्यवधान पैदा कर सकते हैं।
मसलन, सोशल मीडिया और डेटा विश्लेषण ने एल्गोरिद्म को पत्रकारों पर हावी एक ऐसे अतिरिक्त 'संपादक' के रूप में खड़ा कर दिया, जिसकी दखलअंदाजी ने उनकी संपादकीय स्वायत्तता को कमजोर कर दिया।
अब जेनरेटिव एआई एक नया खतरा लेकर आया है, जिसने समाचार माध्यमों के अस्तित्व को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
पत्रकारिता में बदलाव और उसके सामने चुनौती
जेनरेटिव एआई को लेकर पत्रकारों की चिंता पहले इस्तेमाल किए गए अन्य स्वचालित टूल की तुलना में कहीं अधिक है, क्योंकि चैटबॉट अब ऐसी सामग्री तैयार कर सकते हैं, जो मानवीय लेखन जैसी प्रतीत होती है। इसी कारण पत्रकार लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि समाचारों को परखकर जनता तक पहुंचाने वाले 'द्वारपाल' (गेटकीपर) के रूप में उनकी भूमिका अपरिहार्य है।
ऐसे में यदि समाचार संस्थान पत्रकारिता में एआई का सहारा लेते हैं, तो सबसे अहम सवाल यह होगा कि नैतिकता और गुणवत्ता से जुड़े मुद्दों का समाधान कैसे किया जाए। कानून से लेकर चिकित्सा तक कई क्षेत्रों के व्यस्त पेशेवरों को तब भारी नुकसान उठाना पड़ा, जब उनके जेनरेटिव एआई ने अपेक्षित दायरे से हटकर देखने में विश्वसनीय, लेकिन पूरी तरह काल्पनिक जानकारी तैयार कर दी।
यह स्थिति पत्रकारों के लिए और भी बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों में पत्रकारिता पहले ही जनता के घटते विश्वास की चुनौती से जूझ रही है। ऐसे में सामग्री तैयार करने के लिए एआई पर निर्भरता उन गलतियों की आशंका बढ़ा देती है, जिनकी कीमत एबीसी जैसे समाचार संस्थान नहीं चुका सकते।
हालांकि, यदि समाचार कक्ष (न्यूजरूम) एआई से तैयार सामग्री के सत्यापन, संपादन और सावधानीपूर्वक चयन पर अतिरिक्त ध्यान दें, तो इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे समाचारों के 'द्वारपाल' के रूप में पत्रकारों की भूमिका पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन इसके लिए यह भी आवश्यक है कि दर्शकों और पाठकों का पत्रकारों पर भरोसा बना रहे तथा वे उनके विवेक, विश्लेषण और निर्णय क्षमता को महत्व दें।
ये बदलाव पत्रकारिता में एक नए प्रकार के कार्य को जन्म दे रहे हैं, जो लंबे समय से पत्रकारिता के केंद्र में रही पारंपरिक समाचार-निर्माण प्रक्रिया से ध्यान हटाकर सत्यापन, चयन और गुणवत्ता सुनिश्चित करने जैसे कार्यों पर अधिक केंद्रित है।
अवसरों से भरा नया दौर
दूसरी ओर, एआई के नए टूल पत्रकारों को अपने काम को अधिक प्रभावी बनाने के नए अवसर भी उपलब्ध कराते हैं। जिन बड़े भाषा मॉडल और अन्य एआई टूल का इस्तेमाल आम लोग कार्यालयी ई-मेल लिखने या मनोरंजक तस्वीरें तैयार करने के लिए करते हैं, उन्हीं का उपयोग दुनिया भर के पत्रकार अभूतपूर्व खोजी रिपोर्टिंग और समाचार निर्माण में भी कर रहे हैं।
यूक्रेन में रूस की मौजूदगी पर बीबीसी की गहन रिपोर्टिंग में एआई की मदद से बड़ी मात्रा में उपलब्ध पाठ्य सामग्री और वीडियो का विश्लेषण किया गया। इससे ऐसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए, जिन्हें केवल मानवीय प्रयासों से हासिल करना बेहद कठिन, बल्कि कई मामलों में लगभग असंभव था।
'ग्लोबल साउथ' के समाचार संगठनों ने भी संसाधनों की पुरानी कमी से निपटने के लिए एआई का सहारा लिया है। इसकी मदद से वे सामग्री का नए स्वरूप में उपयोग करने और उसका विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करने में सफल रहे हैं। इससे पहले से ही काम का अत्यधिक बोझ झेल रहे संवाददाताओं और समाचार कक्षों की कार्यक्षमता बढ़ी है।
जेनरेटिव एआई समय की बचत भी कर सकता है। यदि नियमित समाचार तैयार करने के काम में एआई उपकरणों का उपयोग किया जाए, तो पत्रकारों के पास अपने पाठकों और दर्शकों के साथ बेहतर संबंध बनाने, समाचारों की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देने और पत्रकारिता के विशिष्ट महत्व को अधिक प्रभावी ढंग से स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध हो सकता है।
पत्रकारों का विस्थापन या पत्रकारिता का?
एबीसी में ये बदलाव ऐसे समय हो रहे हैं, जब पत्रकारिता के लिए धन और संसाधन लगातार कम होते जा रहे हैं। लंबे समय तक मीडिया व्यवस्था को आधार देने वाले कारोबारी मॉडल बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के कारण सतत नहीं रह गए हैं। वहीं, ऑस्ट्रेलिया के समाचार संस्थानों को अब दुनिया भर से उपलब्ध ऑनलाइन समाचार सामग्री से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है।
एआई टूल विस्थापन की आशंका को और बढ़ा सकते हैं। उदाहरण के लिए, सर्च इंजन अब मूल समाचार स्रोत तक पाठकों को भेजने के बजाय एआई-आधारित सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे मूल समाचार संस्थानों की वेबसाइट पर पहुंच प्रभावित हो रही है।
इसके अलावा, एआई से तैयार समाचार ऑस्ट्रेलिया के मीडिया संस्थानों की पहचान को धुंधला कर सकते हैं या उपयोगकर्ताओं को बड़े अंतरराष्ट्रीय समाचार संगठनों, खासकर अमेरिका स्थित संस्थानों, की ओर मोड़ सकते हैं। ऐसे में समाचार कक्ष एक ओर यह तय करने में जुटे हैं कि एआई का सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए, तो दूसरी ओर वे इस चुनौती से निपटने की रणनीति भी बना रहे हैं कि जब एआई स्वयं समाचार का एक स्रोत बनता जा रहा है, तब उससे प्रतिस्पर्धा कैसे की जाए।
समाचार कार्यों में एआई के उपयोग को लेकर एबीसी के उद्देश्य उस लंबे ऐतिहासिक रुझान के अनुरूप हैं, जिसके तहत पत्रकारिता हमेशा नयी प्रौद्योगिकी द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली अत्याधुनिक क्षमताओं को अपनाने का प्रयास करती रही है।
पत्रकारिता में एआई से मिलने वाली दक्षता और कार्यक्षमता में वृद्धि वास्तविक है। दिलचस्प बात यह है कि लोग स्वयं एआई प्रौद्योगिकी पर पूरी तरह भरोसा न करने के बावजूद उससे तैयार परिणामों की उपयोगिता को स्वीकार कर सकते हैं।
द कन्वरसेशन खारी सुरेश
सुरेश
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