वाणिज्यिक या दीवानी विवादों के निपटारे के लिए पीएमएलए का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: उच्च न्यायालय
सं, अरूणव, जफर रवि कांत रवि कांत
- 08 Jul 2026, 12:26 AM
- Updated: 12:26 AM
लखनऊ, सात जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि 'धन शोधन निवारण अधिनियम' (पीएमएलए) का इस्तेमाल विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक या दीवानी विवादों में दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि यह कानून अनुबंध संबंधी या वित्तीय विवादों के समाधान का माध्यम नहीं है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने सोमवार को तुलसियानी कंस्ट्रक्शन एंड डेवलपर्स लिमिटेड तथा उसके निदेशकों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की धनशोधन संबंधी कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने विशेष पीएमएलए अदालत के 30 जनवरी के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत शिकायत पर संज्ञान लेकर आरोपियों को तलब किया गया था।
न्यायमूर्ति विद्यार्थी ने कहा, ''मेरे विचार में पीएमएलए के तहत यह कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण तरीके से प्रतिशोध की भावना से शुरू की गई है, ताकि आवेदकों पर दबाव डालकर फ्लैट खरीदारों की शिकायतों का समाधान कराया जा सके। उनसे फ्लैट हस्तांतरित कराने या धनवापसी कराने के लिए उन्हें उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने के बजाय पीएमएलए का सहारा लिया गया है। इसलिए यह कार्यवाही निरस्त किए जाने योग्य है।''
अदालत ने कहा कि यह विवाद मूल रूप से एक बिल्डर, बैंक और फ्लैट खरीदारों के बीच अनुबंध संबंधी दायित्वों से जुड़ा था, लेकिन इसे पीएमएलए के तहत आपराधिक रंग दे दिया गया।
अदालत ने कहा कि धनशोधन निरोधक कानून का उद्देश्य दीवानी विवादों का निपटारा कराना या पक्षकारों पर वाणिज्यिक दावों के निस्तारण के लिए दबाव बनाना नहीं है।
इस मामले की शुरुआत पंजाब नेशनल बैंक द्वारा दर्ज कराई गई एक प्राथमिकी से हुई थी। बैंक का आरोप था कि गृह ऋण स्वीकृत होने के बावजूद बिल्डर ने खरीदारों को फ्लैट नहीं सौंपे, जिससे बैंक को वित्तीय नुकसान हुआ।
इसी प्राथमिकी के आधार पर ईडी ने प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की और कंपनी तथा उसके निदेशकों के खिलाफ धनशोधन का मामला दर्ज किया।
पीठ ने कहा कि ईडी जिन चार ऋण खातों पर निर्भर थी, उनमें से एक कभी गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) नहीं बना, दो खातों का पहले ही निपटारा हो चुका था और चौथा भी एकमुश्त समझौते के जरिए सुलझा लिया गया था।
अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में विवाद मूलतः दीवानी और वाणिज्यिक प्रकृति का था।
पीठ ने यह भी कहा कि ईडी ने वर्ष 2012 में खरीदी गई एक संपत्ति को अवैध रूप से कुर्क किया, जबकि कथित अनुसूचित अपराध वर्ष 2022 का था।
अदालत ने कहा कि ऐसी संपत्ति को 'अपराध से अर्जित संपत्ति' (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) नहीं माना जा सकता।
उच्च न्यायालय ने विशेष पीएमएलए अदालत के आदेश पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि उसने आरोपियों की आपत्तियों पर विचार किए बिना और पर्याप्त कारण दर्ज किए बिना शिकायत पर संज्ञान ले लिया।
अदालत ने कहा कि यह आदेश न्यायिक विवेक के समुचित प्रयोग के अभाव को दर्शाता है।
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