अहमदाबाद सिलसिलेवार बम विस्फोट भारत की संप्रभुता पर हमला था: गुजरात उच्च न्यायालय
वैभव
- 14 Jul 2026, 07:31 PM
- Updated: 07:31 PM
अहमदाबाद, 14 जुलाई (भाषा) गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि 2008 का अहमदाबाद शृंखलाबद्ध बम विस्फोट ''भारत की संप्रभुता पर हमला'' था और इसका मुख्य मकसद लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को सत्ता से बेदखल करना था।
न्यायमूर्ति ए.वाई. कोगजे और न्यायमूर्ति समीर दवे की खंडपीठ ने 7 जुलाई को इस मामले में इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के 38 सदस्यों की फांसी की सजा और 11 अन्य की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। 2,223 पृष्ठों का पूरा फैसला सोमवार को उपलब्ध हुआ।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यह मामला ''दुर्लभ से दुर्लभतम'' श्रेणी का था, और अगर इसमें उपयुक्त सजा नहीं दी गई या सजा देने से बचने के लिए छोटे-मोटे बहाने ढूंढे गए, तो यह न्याय नहीं होने जैसा होगा।
अदालत ने कहा, ''इसमें कोई शक नहीं है कि इस तरह का सुनियोजित हमला भारत की संप्रभुता पर हमला है, जिसका मकसद लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को सत्ता से हटाना था, जैसा कि गवाहों के बयानों से भी पता चलता है।''
उच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि विस्फोटों में 56 लोगों की मौत हुई और 240 अन्य घायल हुए।
अदालत ने 2008 के मुंबई आतंकी हमले के दौरान पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब का उदाहरण देते हुए कहा कि मौजूदा मामला भी उसी श्रेणी में आता है। कसाब की फांसी की सजा को उच्चतम न्यायालय ने इस आधार पर बरकरार रखा था कि यह ''बहुत दुर्लभ से दुर्लभतम'' मामला था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि मरने वालों की संख्या, ''साजिश का व्यापक दायरा'', ''समाज में बड़े पैमाने पर दहशत का माहौल बनाने'' का इरादा, मुकदमे की सुनवाई के दौरान दोषियों का व्यवहार, साजिश का पैमाना और इस ''अमानवीय और कायराना हरकत'' में बेगुनाह लोगों की जान जाना -- इन सभी बातों ने फांसी की सजा को न्यायोचित ठहराया।
उच्च न्यायालय ने कहा, ''बम विस्फोट जिस तरह से किए गए, उससे दोषियों की सोच और बेगुनाह लोगों की जान लेने के उनके मंसूबे का पता चलता है।''
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि कुछ दोषियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और किसी को अपने किये पर पछतावा नहीं है। जेल में रहने के दौरान उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी, और रिकॉर्ड में ऐसी कोई बात नहीं थी जिससे उन्हें सजा सुनाते समय नरमी बरती जा सके।
अहमदाबाद में 26 जुलाई 2008 को विभिन्न इलाकों में महज 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार बम विस्फोट हुए थे। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 200 से अधिक लोग घायल हुए थे।
विस्फोट उन अस्पतालों में भी किए गए थे, जहां घायलों को उपचार के लिए ले जाया जा रहा था। भारत में किसी आतंकी हमले के दौरान अस्पतालों को निशाना बनाए जाने की यह पहली घटना थी।
खंडपीठ ने कहा कि मुख्य रूप से हिंदू या गैर-मुस्लिम इलाकों में हुए धमाकों का मकसद ''हमारे संविधान के तहत परिकल्पित व्यवस्थित समाज की नींव पर प्रहार करना था, और इसलिए यह आतंकवादी कृत्य था।''
पीड़ितों को मुआवजा देने का निर्देश देते हुए, अदालत ने इस बात पर गौर किया कि सरकार ने उनसे यह नहीं पूछा था कि क्या वे कानूनी सहायता के तहत उपलब्ध कराए गए वकीलों से अपनी पैरवी करवाना चाहते हैं।
उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को प्रत्येक मृतक के परिजन को 10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल लोगों को पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि आरोपियों का आचरण उनके ''अड़ियल रवैये'' को दर्शाता है। उन्होंने संकेत दिया कि उन्होंने साबरमती केंद्रीय जेल में रहने के दौरान 213 फुट लंबी सुरंग खोदी थी और यदि समय रहते इसका पता न चलता तो वे भागने में सफल हो जाते।
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि मौत की सजा या उम्रकैद पाने वाले लगभग सभी दोषियों का गंभीर आपराधिक इतिहास था।
शेष 11 दोषियों की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि उन्होंने आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में भाग लिया तथा साजिश के लिए स्कूटर, प्लास्टिक के कंटेनर और घड़ियों की व्यवस्था की। इसके अलावा उन्होंने अन्य आरोपियों के लिए सुरक्षित ठिकानों की भी व्यवस्था की थी।
मुकदमे का सामना करने वाले 78 लोगों में से 49 को फरवरी 2022 में दोषी करार दिया गया। यह मुकदमा अहमदाबाद में 21 विस्फोटों के लिए दर्ज 20 प्राथमिकी और सूरत में दर्ज 15 प्राथमिकी (जहां लगाए गए बम में विस्फोट नहीं हुआ था) को आपस में मिलाकर चलाया गया था।
फरवरी 2022 में एक विशेष अदालत ने इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
इनमें 'सिमी' का पूर्व नेता सफदर नागौरी तथा गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल और उत्तर प्रदेश समेत 11 राज्यों से उसके सहयोगी शामिल थे।
यह पहली बार था, जब किसी अदालत ने एक साथ इतनी बड़ी संख्या में दोषियों को मौत की सजा सुनाई। जनवरी 1998 में, तमिलनाडु की एक टाडा अदालत ने राजीव गांधी हत्याकांड के सभी 26 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी।
भाषा सुभाष वैभव
वैभव
1407 1931 अहमदाबाद