वांगचुक के पिता से इंदिरा गांधी की 1984 की मुलाकात फिर चर्चा में, सरकारों के रवैये पर छिड़ी बहस
दिलीप
- 18 Jul 2026, 04:28 PM
- Updated: 04:28 PM
नयी दिल्ली, 18 जुलाई (भाषा) चार दशक पहले लद्दाखी नेता दिवंगत सोनम वांग्याल ने जब लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंची थीं और उन्होंने मांग पर सकारात्मक कदम उठाने का भरोसा देकर वांग्याल को अनशन खत्म करने के लिए राजी किया था। ऐतिहासिक अभिलेखों में यह जानकारी मिलती है।
वांग्याल के चार दशक पुराने अनशन की यादें शुक्रवार को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन गईं, जब उनके बेटे, जलवायु कार्यकर्ता एवं शिक्षाविद् सोनम वांगचुक, अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के 20वें दिन भी डटे रहे। इस दौरान कई राजनीतिक नेताओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने वांग्याल के अनशन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया की तुलना मौजूदा सरकार के रुख से की।
इस बीच, शनिवार को जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को उनके अनशन के 21वें दिन तबीयत बिगड़ने के बाद दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। पुलिस ने कहा कि चिकित्सकीय सलाह और उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप वांगचुक को अस्पताल ले जाया गया है।
वांगचुक नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और इस विवाद के कारण कथित तौर पर कुछ छात्रों की मौत के विरोध में 28 जून से कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं।
शुक्रवार को सोशल मीडिया पर वांग्याल के अनशन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी मुलाकात की तस्वीरें भी व्यापक रूप से साझा की गईं। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री ने वांग्याल को भरोसा दिलाया था कि उनकी मांग पर विचार किया जाएगा और उन्हें अनशन समाप्त करने के लिए राजी किया था। वर्ष 1989 में लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा प्रदान किया गया।
सोनम वांग्याल के अनशन का यह ऐतिहासिक प्रसंग कांग्रेस के भीतर भी चर्चा में रहा। पार्टी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक वरिष्ठ नेता से कहा कि उन्हें जंतर-मंतर जाकर सोनम वांगचुक से मुलाकात करनी चाहिए। उन्होंने 1984 की उस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं लेह गई थीं और सोनम वांग्याल से सीधे संवाद किया था। उन्होंने इसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति सरकार के रवैये का आदर्श उदाहरण बताया।
अब तक कांग्रेस ने इस आंदोलन से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी थी, जबकि कई विपक्षी दलों के नेताओं ने खुले तौर पर इसका समर्थन किया। हालांकि, बृहस्पतिवार को कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने वांगचुक से अनशन समाप्त करने की अपील की थी। वहीं, शुक्रवार को पार्टी के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा जंतर-मंतर पहुंचकर उनसे मिले।
वांग्याल और वांगचुक के आंदोलनों के प्रति सरकारों की प्रतिक्रिया की तुलना पवन खेड़ा ने भी सार्वजनिक रूप से की। जंतर-मंतर पर वांगचुक से मुलाकात के बाद उन्होंने 'एक्स' पर लिखा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करना संविधान प्रदत्त अधिकार है और अनशन कर रहे लोगों से संवाद करना सरकार की जिम्मेदारी है।
उन्होंने लिखा, ''1984 में इंदिरा गांधी ने यही किया था। 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने भी यही किया था।''
दिवंगत सोनम वांग्याल लद्दाख के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और अविभाजित जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। लद्दाख की संवैधानिक और राजनीतिक आकांक्षाओं को लेकर जनमत तैयार करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है।
वांग्याल की भूमिका को लेकर एक बार फिर बढ़ी चर्चा के बीच सोनम वांगचुक के कई पुराने वीडियो भी सोशल मीडिया पर फिर से साझा किए जा रहे हैं। ऐसे ही एक चर्चित वीडियो में वांगचुक बताते हैं कि इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के दौरान उन्होंने अपने पिता का परिचय जम्मू-कश्मीर सरकार के मंत्री के बजाय किसान के रूप में दिया था, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके पारिवारिक प्रभाव का उनकी प्रवेश प्रक्रिया पर कोई असर पड़े।
भाषा
खारी दिलीप
दिलीप
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