जम्मू-कश्मीर: अदालत ने यौन शोषण मामले में दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले व्यक्ति की अपील खारिज की
जितेंद्र नेत्रपाल
- 17 Aug 2024, 06:18 PM
- Updated: 06:18 PM
श्रीनगर, 17 अगस्त (भाषा) जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने नाबालिग से यौन शोषण के मामले में अधीनस्थ अदालत के फैसले को चुनौती देने वाले एक व्यक्ति की अपील को खारिज कर दिया।
न्यायमूर्ति संजय धर की अदालत ने कुलगाम के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (त्वरित अदालत) के 22 फरवरी के दोषसिद्धि निर्णय को बरकरार रखा।
सज्जाद अहमद भट को धारा 376 के साथ-साथ रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) की धारा 511 के तहत दोषी ठहराया गया था और उसे चार वर्ष के कठोर कारावास के साथ 10,000 रुपये के जुर्माने की भी सजा सुनाई गई थी।
भट ने दोषसिद्धि के फैसले और सजा के आदेश को चुनौती दी।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता का अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष दिया गया बयान अभियोजन पक्ष के मुकदमे से मेल नहीं खाता लेकिन अदालत ने उसे दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष के गवाह की ‘अपुष्ट गवाही’ पर भरोसा किया, जो कानून के अनुसार नहीं है।
उसने यह भी दलील दी कि मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं, विशेष रूप से कथित घटना वाली जगह के संबंध में अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में विरोधाभास था लेकिन अधीनस्थ न्यायालय ने विवादित निर्णय पारित करते समय इसे नजरअंदाज कर दिया।
भट ने कहा कि यहां तक कि चिकित्सा साक्ष्य भी अभियोजन पक्ष के बयान का समर्थन नहीं करते हैं और इस आधार पर भी विवादित निर्णय को रद्द किया जा सकता है।
अपीलकर्ता ने यह भी दलील दी कि जांच अधिकारी उन अन्य बच्चों के बयान दर्ज करने में विफल रहा, जो घटना से ठीक पहले कथित तौर पर पीड़िता के साथ खेल रहे थे।
अपीलकर्ता ने अंत में दलील दी कि अभियोजन पक्ष आरपीसी की धारा 376/511 के तहत अपराध को साबित करने में नाकाम रहा है।
उच्च न्यायालय ने हालांकि कहा कि मौजूद साक्ष्य यह साबित करने के लिए काफी हैं कि अपीलकर्ता ने पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया था, जिसके परिणामस्वरूप उसे मामूली चोटें आईं। इसने कहा कि इसके साथ ही पीड़िता के शरीर के कुछ हिस्सों पर वीर्य पाए जाने के भी सबूत हैं।
अदालत ने कहा कि मौजूद सबूत स्पष्ट रूप से इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अपीलकर्ता/आरोपी ने पीड़िता से दुष्कर्म करने की अपनी मंशा को पूरा करने के लिए वह सबकुछ किया जो आवश्यक था लेकिन अगर अभियोजन पक्ष का गवाह सही समय पर घटनास्थल पर नहीं पहुंचता, तो अपीलकर्ता एक कम उम्र की बच्ची से दुष्कर्म करने की अपनी योजना में सफल हो जाता।
उच्च न्यायालय ने कहा कि इसलिए यह दुष्कर्म के प्रयास का स्पष्ट मामला है और इस संबंध में अपीलकर्ता/आरोपी के वकील की दलीलें बेबुनियाद हैं।
न्यायमूर्ति धर ने कहा कि उन्हें अधीनस्थ न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं दिखता।
भाषा जितेंद्र