पूर्व बर्धमान के प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों में कृषि संबंधी मुद्दे छाए
वैभव
- 27 Apr 2026, 09:33 PM
- Updated: 09:33 PM
(सुप्रतीक सेनगुप्ता)
कोलकाता, 27 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल का "धान का कटोरा" कहे जाने वाले पूर्व बर्धमान जिले के कई प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों में कृषि संबंधी मुद्दे चुनावों के दौरान छाए हुए हैं।
राज्य के कुल धान उत्पादन में लगभग 10 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले पूर्व बर्धमान के बर्धमान उत्तर, केतुग्राम, मंगलकोट और औसग्राम जैसे विधानसभा क्षेत्र उस पट्टी का भी हिस्सा हैं, जिसे आलू की अच्छी पैदावार के लिए जाना जाता है।
ये विधानसभा क्षेत्र एक समय वामपंथी दलों का गढ़ हुआ करते थे। इनमें मुसलमानों और अनुसूचित जातियों (एससी) के लोगों की अच्छी खासी आबादी है।
कृषि मानचित्र पर जिले का अहम स्थान होने के बावजूद चुनाव प्रचार के दौरान गढ़ा गया विमर्श दो अलग-अलग पहलुओं को उजागर करता है : पहला-फसलों की खरीद और कीमतों को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त नाराजगी, दूसरा-नागरिक बुनियादी ढांचे को लेकर शहरी क्षेत्रों में व्याप्त असंतोष।
पूर्व बर्धमान के किसान कहते हैं कि आर्थिक पक्ष पर उनकी दुश्वारियां बढ़ रही हैं, क्योंकि फसलों की खरीद से जुड़ी अड़चनों, कृषि की बढ़ती लागत और अस्थिर बाजार मूल्य के कारण धान और आलू, दोनों की खेती प्रभावित हो रही है।
स्थानीय किसानों का आरोप है कि सीमित खरीद व्यवस्था के कारण कटाई के समय में भारी देरी होती है और उन्हें अक्सर अपनी उपज निजी व्यापारियों और बिचौलियों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित औसग्राम विधानसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच कड़ा मुकाबला होने का अनुमान है। हालांकि, इस क्षेत्र में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की भी मजबूत पकड़ है।
साल 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के अभेदानंद थंदर ने भाजपा की कलिता माजी को हराकर यह सीट बरकरार रखी थी।
थंदर ने कहा, "औसग्राम के लोगों ने ग्रामीण सड़कों, सिंचाई और कल्याणकारी योजनाओं के लिए हमारी प्रतिबद्धता के कारण लगातार हमारा समर्थन किया है। हमें यकीन है कि वे हमें फिर से जीत का आशीर्वाद देंगे।"
वहीं, माजी ने क्षेत्र में बाजी पलटने का भरोसा जताया। उन्होंने कहा, "जमीनी स्तर पर बदलाव की प्रबल इच्छा है। बेरोजगारी और औद्योगिक विकास की कमी जैसे मुद्दों का पर्याप्त समाधान नहीं हुआ है।"
साल 2011 के विधानसभा चुनावों में यह सीट जहां वाम मोर्चा की झोली में गई थी, वहीं 2016 में तृणमूल कांग्रेस ने इस पर जीत हासिल की थी और अगले चुनाव में भी उसने अपना कब्जा बरकरार रखा था।
किसानों के सामने पेश आने वाली चुनौतियों के बारे में एक किसान ने कहा, "एमएसपी तो है, लेकिन हमारे लिए नहीं। हमें क्या मिलता है, यह व्यापारी पर निर्भर करता है, सरकार पर नहीं।"
मंगलकोट में 1962 के बाद से हुए 16 विधानसभा चुनावों में से 11 में वामपंथी उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। उनका व्यापक समर्थन 1940 के दशक में अजय नदी के किनारे आई विनाशकारी बाढ़ के बाद हुए जन आंदोलनों का नतीजा था।
स्थानीय कॉलेज के प्रोफेसर श्रीजिब बसु ने कहा कि मंगलकोट में मुस्लिम और एससी समुदायों के मतदाताओं की संख्या 63 फीसदी से अधिक है, जो चुनावों में उन्हें एक निर्णायक कारक बनाती है।
साल 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का किला ढहने के बाद भी माकपा ने मंगलकोट सीट बरकरार रखी थी, जहां उसके उम्मीदवार शाहजहां चौधरी ने तृणमूल कांग्रेस के अपूर्ब चौधरी को महज 126 वोटों से हराया था। हालांकि, 2016 में तृणमूल ने मंगलकोट सीट माकपा से छीन ली।
मंगलकोट में धान के अलावा गेहूं, दालें, तिलहन, जूट और सब्जियां भी उगाई जाती हैं। गैर-कृषि गतिविधियों में चावल मिलें, कोल्ड स्टोरेज, ईंट भट्टे और ग्रामीण हाट शामिल हैं।
आलू की खेती करने वाले अमित कुइल्या ने कहा, "हमने बेहतर सिंचाई व्यवस्था और अधिक उपज देने वाली किस्में अपनाकर उपज में सुधार किया। लेकिन अधिक उपज से स्थिर आय प्राप्त नहीं हुई है।"
केतुग्राम में तृणमूल ने मौजूदा विधायक शेख साहोनवेज को मैदान में उतारा है, जो लगातार चौथी बार चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला भाजपा उम्मीदवार अनादि घोष के साथ-साथ आईएसएफ और एजेयूपी जैसी पार्टियों के प्रत्याशियों से है। इस क्षेत्र की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 34 फीसदी, जबकि एससी समुदायों की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है।
वहीं, एससी समुदाय के लिए सुरक्षित बर्धमान उत्तर सीट पर भी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में कांटे की टक्कर के आसार हैं। इस सीट पर तृणमूल ने निसीथ कुमार मलिक को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने संजय दास, कांग्रेस ने सुदीप दास और माकपा ने मामोनी मंडल को टिकट दिया है।
बर्धमान उत्तर सीट पारंपरिक रूप से माकपा का गढ़ रही है। 2016 तक हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों में से 11 में माकपा उम्मीदवारों ने इस सीट पर जीत दर्ज की है।
भाषा पारुल माधव वैभव
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