स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच के मामले में राष्ट्रव्यापी स्तर पर उल्लेखनीय सुधार हुआ है : एनएसओ सर्वे
नरेश
- 29 Apr 2026, 04:52 PM
- Updated: 04:52 PM
नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा)राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के 80वें 'घरेलू उपभोग: स्वास्थ्य सर्वेक्षण' के निष्कर्षों के मुतबिक लक्षित सरकारी हस्तक्षेपों, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और बीमा कवरेज में वृद्धि से देश भर में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
एनएसओ के इस सर्वेक्षण में राष्ट्रव्यापी स्तर पर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को शामिल किया गया। सर्वेक्षण के तहत 1,39,732 परिवारों से प्रश्नवली भरवाई गई, जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों के 76,296 और शहरी क्षेत्रों के 63,436 परिवार शामिल थे, जिससे स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच, सामर्थ्य और उपयोग की प्रवृत्ति को लेकर ठोस और जमीनी स्तर की अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि एनएसओ के 80वें सर्वेक्षण के निष्कर्ष सरकार द्वारा वर्षों से स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश में की गई निरंतर वृद्धि के प्रभाव को इंगित करती है।
इसके मुताबिक बजट आवंटन में वृद्धि से प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तरों पर स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना का महत्वपूर्ण विस्तार संभव हुआ है, मानव संसाधन मजबूत हुए हैं और निवारक, प्रोत्साहक और उपचारात्मक देखभाल पर केंद्रित प्रमुख पहलों को बढ़ाने में सहायता मिली है।
सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में अस्पताल में भर्ती होने पर एक बार में औसत चिकित्सा व्यय (ओओपीई) 11,285 रुपये दर्ज किया गया, जो दर्शाता है कि देश में आधे से अधिक अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में अपेक्षाकृत कम खर्च होता है। इसमें कहा गया कि केवल कुछ ही मामलों में अधिक खर्च के कारण औसत (माध्य मूल्य) में वृद्धि देखी गई है।
एनएसओ के 80वें दौर के सर्वेक्षण में कहा गया कि उपरोक्त आंकड़ों से इंगित होता है कि अधिक खर्च व्यापक नहीं है, बल्कि विशेष उपचार की आवश्यकता वाले विशिष्ट मामलों तक ही सीमित है। इसके अलावा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में भर्ती होने वाले आधे से अधिक मामलों में ओओपीई केवल 1,100 रुपये है।
इसमें कहा गया कि अहम तथ्य यह है कि बर्हिगमन मरीजों के लिए सरकारी अस्पतालों में सेवाओं का औसत ओओपीई शून्य है, जो दर्शाता है कि नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह से मुफ्त में प्राप्त करने में सक्षम है।
रिपोर्ट के मुताबिक सरकार की 2015 में शुरू की गई मुफ्त दवा सेवा पहल (एफडीएसआई) और मुफ्त निदान पहल (एफडीआई) ने देश के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी लोगों को मुफ्त दवाएं और निदान सेवाएं उपलब्ध कराई हैं।
सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक एवं आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता में आए इस महत्वपूर्ण बदलाव में देश भर में स्थित 1.84 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) का भी योगदान है। ये मंदिर समुदायों के निकट निवारक, प्रोत्साहक और उपचारात्मक सेवाएं प्रदान करके व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के दायरे को काफी हद तक विस्तारित कर रहे हैं। ये केंद्र स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता बढ़ाने के लिए डिजिटल स्वास्थ्य नवाचारों का भी लाभ उठा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक नमूना परिवहन सहित 'इन-हाउस हब-एंड-स्पोक मॉडल' के माध्यम से निदान को मजबूत करने से स्वास्थ्य सेवा के विभिन्न स्तरों पर निदान सेवाओं की पहुंच और उपलब्धता में सुधार हुआ है।
इसके अलावा, किफायती दवाएं और विश्वसनीय उपचार प्रत्यारोपण (एएमआरआईटी) पहल, जो 29 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 220 से अधिक फार्मेसियों के साथ काम करती है, बाजार दरों पर 50 प्रतिशत तक की छूट पर 6,500 से अधिक दवाएं उपलब्ध कराती है, जिससे उपचार की वहनीयता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
आयुष्मान भारत - प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जेएवाई) और अन्य लक्षित सरकारी हस्तक्षेपों ने इन लाभों को और मजबूत किया है, जिससे पहुंच बढ़ी है, वित्तीय बाधाएं कम हुई हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में विश्वास मजबूत हुआ है।
रिपोर्ट में कहा गया कि यह उत्साहजनक है कि इस बढ़ी हुई वहनीयता के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में भी काफी वृद्धि हुई है। बीमारियों की रिपोर्ट करने वाली आबादी का अनुपात (पीपीआरए) 75वें और 80वें दौर के बीच लगभग दोगुना हो गया है - ग्रामीण क्षेत्रों में 6.8 प्रतिशत से बढ़कर 12.2 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 9.1 प्रतिशत से बढ़कर 14.9 प्रतिशत हो गया है, जो बेहतर जागरूकता और स्वास्थ्य संबंधी सक्रिय व्यवहार की ओर निर्णायक बदलाव का संकेत देता है।
सर्वेक्षण में एक महत्वपूर्ण पहलु महामारी विज्ञान संबंधी परिवर्तन भी सामने आया है, जिसमें संक्रामक रोगों में कमी और मधुमेह तथा हृदय संबंधी बीमारियों जैसे गैर-संक्रामक रोगों की बढ़ती व्यापकता देखी गई है। यह निरंतर सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) प्रयासों, ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण समितियों (वीएचएसएनसी) जैसे सामुदायिक मंचों के माध्यम से अंतरक्षेत्रीय समन्वय और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल एवं सामुदायिक स्तर पर बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग पहलों के प्रभाव को दर्शाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ती मांग के अनुरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग बढ़ा है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बाह्य रोगी देखभाल के लिए, जहां उपयोग 33 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत हो गया है। यह सुधार व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के विस्तार के कारण संभव हुआ है, जिसमें निवारक, संवर्धक और प्रारंभिक निदान देखभाल पर जोर दिया गया है, साथ ही मुफ्त दवाओं और निदान उपकरणों की उपलब्धता से इसे समर्थन मिला है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जेएवाई) और विभिन्न राज्य योजनाओं सहित सरकार द्वारा वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा कवरेज का तेजी से विस्तार हुआ है और इसी के साथ वित्तीय जोखिम सुरक्षा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
देश में इन सरकारी स्वास्थ्य वित्तपोषित/बीमा योजनाओं के अंतर्गत आने वाली जनसंख्या का प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में 12.9 प्रतिशत से बढ़कर 45.5 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 8.9 प्रतिशत से बढ़कर 31.8 प्रतिशत हो गया है, जो तीन गुना से अधिक की वृद्धि दर्शाता है। यह स्वास्थ्य संबंधी भारी खर्चों से कमजोर आबादी की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक समान पहुंच को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी बयान के मुताबिक सर्वेक्षण में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य परिणामों में निरंतर प्रगति को भी दर्शाया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थागत प्रसव 2017-18 में 90.5 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 95.6 प्रतिशत हो गए हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी अवधि में यह 96.1 प्रतिशत से बढ़कर 97.8 प्रतिशत हो गए हैं।
इसमें कहा गया कि यह सरकार द्वारा गुणवत्ता आश्वासन, जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके), प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) जैसी योजनाओं के माध्यम से सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा देने और गुणवत्तापूर्ण मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को मजबूत करने के निरंतर प्रयासों को दर्शाता है।
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग दो-तिहाई (66.8 प्रतिशत) प्रसव सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में होते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 47 प्रतिशत (लगभग आधा) है।
बयान के मुताबिक एनएसओ सर्वेक्षण से पिछले तीन दौरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग में बढ़ती प्रवृत्ति का भी पता चलता है। इससे ज्ञात होता है कि जहां 2014 में लगभग 28 प्रतिशत ग्रामीण आबादी बाह्य रोगी देखभाल के लिए सार्वजनिक सुविधाओं की ओर रुख करती थी, वहीं 2025 में यह बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई है।
भाषा धीरज नरेश
नरेश
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