जीएचसीएए अध्यक्ष की दोषसिद्धि: उच्चतम न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को स्थगित किया
माधव
- 11 May 2026, 09:04 PM
- Updated: 09:04 PM
नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को गुजरात उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष यतिन ओझा के प्रति नरमी दिखाते हुए गुजरात उच्च न्यायालय के अप्रैल 2024 के उस आदेश को निलंबित कर दिया, जिसमें राज्य न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए उन्हें दोषी ठहराते हुए अदालत की कार्यवाही खत्म होने तक की सजा सुनाई गयी थी।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने हालांकि निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ, अपीलकर्ता द्वारा अपने व्यवहार पर खेद और माफी व्यक्त करते हुए प्रस्तुत 'हलफनामा' के आलोक में, प्रत्येक दो वर्ष के अंतराल पर उनके आचरण की आवधिक समीक्षा करेगी।
यह मामला ओझा द्वारा कथित तौर पर एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान पीठासीन न्यायाधीश पर "फोरम शॉपिंग" का आरोप लगाने से संबंधित है।
ओझा के लिये विवाद कोई नयी बात नहीं हैं। इससे पहले, गुजरात उच्च न्यायालय ने उन्हें उच्च न्यायालय को "जुए का अड्डा" कहने के लिए अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी और 2020 में उनसे "वरिष्ठ अधिवक्ता" का दर्जा छीन लिया था।
अक्टूबर 2021 में हालांकि उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए ओझा के वरिष्ठ अधिवक्ता के दर्जे को 1 जनवरी, 2022 से शुरू होने वाली दो साल की परिवीक्षा अवधि के लिए बहाल कर दिया, इसे उनका "एक और और आखिरी मौका" बताया।
अनुच्छेद 142 के तहत, न्यायालय किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक निर्णय या आदेश पारित कर सकता है।
ओझा 20 दिसंबर, 2025 को 19वीं बार जीएचसीएए के अध्यक्ष चुने गए।
आज (सोमवार को) सुनाए गए फैसले में, न्यायालय ने एक बार फिर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया और ओझा की दोषसिद्धि के साथ-साथ सजा को भी स्थगित कर दिया।
पीठ ने कहा, "उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेपित आदेश में दिए गए कारणों के आधार पर इस न्यायालय द्वारा किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, क्षमादान का अंतिम कार्य करते हुए, हम संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए इस निर्णय के फलस्वरूप अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा को अनिश्चित काल के लिए निलंबित/स्थगित रखने के इच्छुक हैं।"
न्यायालय ने कहा, "इस बीच, अपीलकर्ता को न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत दोषी ठहराए जाने से उत्पन्न कोई भी अयोग्यता या नुकसान लागू नहीं होगा, इसमें 1961 के अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24-ए के तहत अयोग्यता भी शामिल है, लेकिन इसके लिए सीमित नहीं है।"
इसने निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत वचन के आलोक में प्रत्येक दो वर्ष के अंतराल पर अपीलकर्ता के आचरण की आवधिक समीक्षा करेगी।
न्यायालय ने कहा कि यदि ओझा द्वारा इसी प्रकार का कोई और कृत्य किया गया पाया जाता है, तो उच्च न्यायालय को इस मामले में निपटाए गए अपील में एक आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता होगी, जिसमें वर्तमान कार्यवाही में उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित उसकी दोषसिद्धि और सजा को तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग की जाएगी।
भाषा प्रशांत माधव
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