मुंबई उच्च न्यायालय ने आंबेडकर प्रिंटिंग प्रेस के ध्वस्तीकरण पर हैरानी जतायी, पुलिस को फटकार लगायी
सुरेश
- 11 May 2026, 06:39 PM
- Updated: 06:39 PM
मुंबई, 11 मई (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने यहां डॉ. बी. आर. आंबेडकर द्वारा स्थापित प्रिंटिंग प्रेस को 2016 में ढहाये जाने के तौर-तरीकों पर हैरानी जताई है और इस कदम के खिलाफ शिकायतों के बावजूद कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए शहर की पुलिस को फटकार लगाई है।
न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ ने 30 अप्रैल को दिए आदेश में मुंबई पुलिस आयुक्त को इस मुद्दे पर अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आधी रात के बाद प्रिटिंग प्रेस को ढहाये जाने की कार्रवाई दुर्लभ है। आदेश की एक प्रति सोमवार को उपलब्ध कराई गई।
उच्च न्यायालय ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के आयुक्त को एक हलफनामा भी दाखिल करने को निर्देश दिया है, जिसमें यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या शहर में ऐसे समय में तोड़फोड़ करना एक सामान्य प्रक्रिया है।
वंचित बहुजन आघाडी के नेता एवं बी. आर. आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर द्वारा दायर याचिका सहित कई याचिकाओं पर यह आदेश दिया गया।
इन याचिकाओं में जून 2016 में मध्य मुंबई के दादर स्थित ऐतिहासिक बुद्ध भूषण प्रिंटिंग प्रेस को 'अवैध' रूप से तोड़ दिये जाने पर चिंता व्यक्त की गई थी।
याचिकाओं के अनुसार, डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 1930 में दादर में अपने निजी धन से दो भूखंड खरीदे थे। उन्होंने 1945 में एक भूखंड पर न्यास बनाया और प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। दूसरे भूखंड पर दो इमारतें (डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भवन और यशोधरा संगणक केंद्र) थीं।
याचिका में दावा किया गया है कि न्यासियों के बीच कुछ विवाद थे और ढांचे को लेकर झूठी लेखापरीक्षा रिपोर्ट की आड़ में याचिकाकर्ताओं द्वारा आरोपी बनाए गए छह लोगों ने बीएमसी को यह नोटिस जारी करने के लिए उकसाया कि प्रिंटिंग प्रेस की इमारत जर्जर हालत में है।
जून 2016 में आरोपी न्यासी 400 से अधिक लोगों की भीड़ के साथ प्रिंटिंग प्रेस की इमारत को ध्वस्त करने के लिए आए थे।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि जब प्रकाश आंबेडकर के भाई आनंद ने अवैध ध्वस्तीकरण को रोकने के लिए भोईवाड़ा थाने में गुहार लगाई तो पुलिस ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप बुद्ध भूषण प्रिंटिंग प्रेस को ध्वस्त कर दिया गया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि अवैध ध्वस्तीकरण के दौरान डॉ. बी. आर. आंबेडकर द्वारा खरीदी गई मशीनें, उनके हाथ से लिखे संरक्षित दस्तावेज और ''पंचशील फ्लैग'' भी क्षतिग्रस्त हो गए।
बाद में प्रकाश आंबेडकर की शिकायत पर न्यासियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई, लेकिन प्रकाश ने अपनी याचिका में दावा किया कि कोई उचित जांच नहीं की जा रही है।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में सहायक पुलिस आयुक्त के उस हलफनामे पर हैरानी व्यक्त की, जिसमें उन्होंने आरोपों से इनकार किया था। पुलिस अधिकारी ने इन आरोपों को अस्पष्ट और निराधार बताया।
पीठ ने कहा, ''इस तरह के विचारहीन हलफनामे को पढ़ना बेहद व्यथित करने वाला है। शिकायतों पर पुलिस द्वारा की गई धृष्ठता और तरीके पर हम हैरानी व्यक्त करने के लिए विवश हैं। बीएमसी या किसी भी प्राधिकरण द्वारा रात 12 बजे से सुबह सात बजे के बीच ढांचे को तोड़ा जाना अभूतपूर्व नहीं तो दुर्लभ जरूर है।''
अदालत ने घटनास्थल पर तुरंत कार्रवाई न कर पाने और अवैध ध्वस्तीकरण को न रोक पाने के लिए पुलिस को फटकार लगाई तथा कहा कि पुलिस की ओर से स्पष्ट रूप से निष्क्रियता बरती गई थी।
अदालत ने शहर के पुलिस आयुक्त को याचिकाओं के जवाब में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने और घटना के समय भोईवाड़ा थाने में ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों के नाम भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया।
न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 जून की तारीख तय की है।
भाषा शुभम सुरेश
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