मप्र: भोजशाला सरस्वती मंदिर घोषित, अदालत ने परिसर में नमाज अदा करने का आदेश रद्द किया
दिलीप
- 15 May 2026, 10:17 PM
- Updated: 10:17 PM
इंदौर, 15 मई (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने धार जिले के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर विवाद मामले में शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए इस मध्यकालीन स्मारक की धार्मिक प्रकृति हिंदू मान्यताओं में 'ज्ञान की देवी' के रूप में पूजी जाने वाली वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के तौर पर तय की।
अदालत ने इसके साथ ही, एएसआई के दशकों पुराने उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को उस स्थल पर शुक्रवार की नमाज़ अदा करने की अनुमति थी।
अदालत ने रेखांकित किया कि परमार वंश के राजा भोज की विरासत से जुड़े इस स्थल पर हिंदुओं की पूजा-अर्चना की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई है।
उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिए जाने की गुहार स्वीकार की और इसके साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सात अप्रैल 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार स्मारक में नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अप्रैल 2003 के आदेश ने भोजशाला परिसर के भीतर हिंदुओं के पूजा करने के अधिकार को भी सीमित कर दिया था।
न्यायामूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने 242 पन्नों के अपने आदेश में कहा कि वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर 11वीं सदी के इस स्मारक का धार्मिक स्वरूप स्पष्ट है; हालाँकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम पक्ष मस्जिद बनाने के लिए ज़िले में अलग ज़मीन के वास्ते मध्य प्रदेश सरकार से संपर्क कर सकता है।
अदालत ने सभी सामग्री का अवलोकन करने के बाद कहा कि इस बात पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि विवादित क्षेत्र भोजशाला था, जिसमें माँ सरस्वती का मंदिर था।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, ''भोजशाला परिसर और कमाल मौला मस्जिद के विवादित क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप, देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला के रूप में माना गया है और यह भी आदेश दिया कि भोजशाला का क्षेत्र, 3 मार्च 1904 से प्रभावी रूप से, 1958 के अधिनियम के तहत 'एक संरक्षित स्मारक' माना जाएगा।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर पुरातात्विक व ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की अधिसूचनाओं व उसके वैज्ञानिक सर्वेक्षण और कानूनी प्रावधानों की रोशनी में फैसला सुनाया।
यह निर्देश देते हुए कि एएसआई का धार्मिक पहुँच के संरक्षण, परिरक्षण और विनियमन पर पूर्ण पर्यवेक्षी नियंत्रण होगा, न्यायालय ने केंद्र और एएसआई से भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षा से जुड़े मामलों के प्रशासन और प्रबंधन के उद्देश्य से निर्णय लेने को कहा।
अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार कुछ याचिकाकर्ताओं के उन आवेदनों पर 'विचार कर सकती है', जिनमें लंदन संग्रहालय से देवी सरस्वती की 'प्रतिमा' (मूर्ति) को वापस लाने और उसे परिसर के भीतर पुनः स्थापित करने की मांग की गई है।
इस आदेश ने अप्रैल 2003 के एएसआई के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज़ अदा करने की अनुमति दी थी।
उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में शीर्ष अदालत के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया।
अदालत ने मध्यप्रदेश सरकार से यह भी कहा कि वह याचिकाकर्ताओं की उस अर्जी पर विचार करे, जिसमें धार ज़िले में एक मस्जिद के निर्माण के लिए ज़मीन आवंटित करने की मांग की गई है।
अदालत ने कहा ''मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को सुरक्षित करने और पक्षों के बीच पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए... राज्य सरकार, कानून के अनुसार, धार जिले में मुस्लिम समुदाय को ज़मीन का एक उपयुक्त और स्थायी हिस्सा आवंटित करने के वास्ते (ज़मीन के आवेदन पर) विचार कर सकती है; इस समुदाय का प्रतिनिधित्व... किसी मस्जिद और उससे जुड़ी धार्मिक सुविधाओं के निर्माण तथा प्रशासन के लिए विधिवत गठित किसी वक्फ़ संस्था के माध्यम से किया जा सकता है।''
अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों से यह 'बिल्कुल साफ़ है कि विचाराधीन इमारत एक हिंदू मंदिर और संस्कृत भाषा सीखने का स्थान है।'
एएसआई द्वारा प्रस्तुत कुछ रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए अदालत ने कहा कि इन रिपोर्ट में यह उल्लेख है कि यह ढांचा एक ऐसे मंदिर के स्थल पर स्थित है, जिसे शिलालेखों और स्थानीय परंपरा के आधार पर देवी सरस्वती को समर्पित माना जाता है।
उच्च न्यायालय ने कहा, ''1902-03 और उसके बाद की रिपोर्ट इस संरचना को एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पुरातात्विक इमारत के रूप में वर्गीकृत करती हैं, जिसमें 'भोजशाला कमाल मौला' भी शामिल है।''
अदालत ने 'कर्तव्य में जानबूझकर की गई लापरवाही' के लिए एएसआई को फटकार भी लगाई और कहा कि भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद की उपेक्षा करने में केंद्रीय एजेंसी की निरंतर निष्क्रियता और तिरस्कारपूर्ण रवैया, स्मारक अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है।
अदालत ने यह व्यवस्था दी कि किसी स्थल को संरक्षित करने से पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह उस पूजा स्थल की प्रकृति और उसके मूल स्वरूप का पता लगाए।
उच्च न्यायालय ने कहा, "ऐतिहासिक साहित्य और वास्तुकला की विशेषताएं स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि संस्कृत शिक्षा के लिए 'भोजशाला परिसर' का निर्माण राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 ईस्वी में किया गया था, जो कि दूसरे समुदाय द्वारा मस्जिद निर्माण के दावे (अर्थात 28.4.1935) से बहुत पहले का है।''
फैसले के बाद, शहर काज़ी वकार सादिक ने संकेत दिया कि मुस्लिम पक्ष पूरे फैसले की गहन समीक्षा के बाद उच्चतम न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ अपील करेगा।
इसी से जुड़े एक घटनाक्रम में, राज्य सरकार ने 1,200 पुलिसकर्मियों को तैनात किया और उस जगह के चारों ओर बैरिकेड लगा दिए, क्योंकि अदालत का फ़ैसला शुक्रवार की नमाज़ के समय से मेल खा रहा था।
धार के कलेक्टर राजीव रंजन मीणा ने फैसले के मद्देनजर सोशल मीडिया पर भड़काऊ सामग्री प्रसारित करने के खिलाफ सार्वजनिक चेतावनी जारी की।
उच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था।
एएसआई ने 22 मार्च 2024 से इस परिसर का सर्वेक्षण शुरू किया था। एएसआई ने 98 दिनों के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट पेश की थी, जिसके बाद अदालत का यह फैसला आया है।
पीठ ने कहा, ''हमने एएसआई अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों की कसौटी पर और साथ ही अयोध्या मामले में निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर पुरातात्विक व ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की अधिसूचनाओं और सर्वेक्षण रिपोर्ट पर विचार किया है, कि पुरातत्व एक ऐसा विज्ञान है जो बहु-विषयक या अंतर-विषयक दृष्टिकोणों का उपयोग करता है और हमने पुरातात्विक साक्ष्यों की प्रकृति पर भी गौर किया है।"
अदालत ने कहा, ''यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि ज्ञान की एक शाखा के रूप में पुरातत्व, सीखने के विज्ञान से ही अपना आधार प्राप्त करता है। यह वह बुद्धिमत्ता, अनुभव और दूरदृष्टि है, जो व्याख्या की प्रक्रिया का आधार बनती है। इसलिए न्यायालय एएसआई द्वारा किए गए ऐसे बहु-विषयक वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों पर तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर निश्चिंत होकर भरोसा कर सकता है।''
कार्यवाही के दौरान, हिंदू पक्ष ने इस स्थल के संस्कृत शिक्षण केंद्र के रूप में मूल होने के प्रमाण के तौर पर सिक्के और शिलालेख पेश किए। मुस्लिम पक्ष ने, जिसका प्रतिनिधित्व मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी कर रही थी, एएसआई के निष्कर्षों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए चुनौती दी और इस स्थल को मस्जिद का दर्जा दिए जाने की दलील दी।
अदालत ने जैन समुदाय के एक तीसरे दावे पर भी विचार किया, जिसमें यह कहा गया था कि यह स्थल मूल रूप से एक मध्यकालीन जैन मंदिर था।
इस विवाद के संबंध में कि मंदिर में स्थित मूर्ति देवी सरस्वती की थी या माँ अंबिका की, अदालत ने यह राय व्यक्त की कि भारत में जैन धर्म और हिंदू धर्म एक-दूसरे से पूरी तरह अलग या पृथक पहचान रखने वाली चीजें नहीं हैं।
अदालत ने कहा, ''यद्यपि इन दोनों धर्मों में पूजा की रीतियां भिन्न हो सकती हैं, लेकिन प्राचीन काल से ही दोनों धर्म एक ही सर्वोच्च सत्ता की उपासना करते हुए साथ-साथ विकसित हुए हैं। परिणामस्वरूप, जैन और हिंदू दोनों परंपराओं की मूर्तियां अक्सर एक-दूसरे के मंदिरों में पाई जाती हैं।'"
पीठ ने कहा कि इसलिए, उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार की गई खुदाई के दौरान विवादित परिसर के भीतर एक जैन तीर्थंकर की मूर्ति का मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
पीठ ने सामाजिक संगठन 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' और कुलदीप तिवारी व अन्य लोगों की दायर दो अलग-अलग जनहित याचिकाएं मंजूर करते कहा,''भोजशाला परिसर और कमाल मौला मस्जिद के विवादित क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला के रूप में तय किया जाता है।''
अदालत ने कहा, "हम इस निष्कर्ष को दर्ज करते हैं कि ऐतिहासिक साहित्य ने स्थापित किया है कि विवादित क्षेत्र का स्वरूप भोजशाला के रूप में था जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र था और राजा भोज के काल से संबंधित संदर्भों सहित साहित्य और स्थापत्य-संबंधी संदर्भ संकेत देते हैं कि धार में देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर विद्यमान था।"
उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि भारत सरकार और एएसआई भोजशाला मंदिर और इसमें संस्कृत शिक्षा के मामलों के प्रशासन और प्रबंधन के संबंध में निर्णय लेंगे और एएसआई कानूनी प्रावधानों के मुताबिक इस संपत्ति का समग्र प्रशासन और प्रबंधन जारी रखेगा।
अदालत ने यह भी कहा कि हर सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह पुराने स्मारकों व इमारतों, पुरातात्विक तथा ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों, गर्भगृहों और देवी-देवताओं से जुड़े आध्यात्मिक महत्व वाले स्थलों का संरक्षण सुनिश्चित करे।
उच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत दलीलें पेश कीं थीं और विवादित स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लोगों के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा था।
खंडपीठ ने मुस्लिम और जैन पक्षों की ओर से दायर चार याचिकाएं खरिज कर दीं।
भाषा हर्ष नरेश दिलीप
दिलीप
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