आईयूएमएल विधायक के दीप जलाने पर बहस के बीच 'समस्त' ने इस्लामिक नियम का हवाला दिया
नरेश
- 05 Jun 2026, 05:22 PM
- Updated: 05:22 PM
कोझिकोड, पांच जून (भाषा) केरल में सुन्नी-शफी इस्लामी विद्वानों की प्रमुख परिषद, समस्त केरल जमियतुल उलेमा ने कहा है कि मुसलमानों को अन्य धर्मों के अनुयायियों द्वारा उनके धार्मिक अनुष्ठानों के हिस्से के रूप में किए जाने वाले समारोहों और प्रथाओं से परहेज करना चाहिए।
संस्था ने यह बात हाल ही में एक समारोह में मुस्लिम लीग की एक विधायक द्वारा पारंपरिक दीप जलाने को लेकर हुए विवाद के बीच कही।
केरल विधानसभा में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) की पहली महिला विधायक, पेरामब्रा की विधायक फातिमा ताहलिया ने हाल ही में अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक नए रेस्तरां का उद्घाटन करते हुए नीलाविलक्कू (पारंपरिक दीप) प्रज्ज्वलित किया, जिससे केरल के मुस्लिम सामाजिक-राजनीतिक हलकों में इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या एक मुस्लिम जन प्रतिनिधि को ऐसे समारोहों में भाग लेना चाहिए।
'समस्त सेंट्रल मुशावारा' ने तीन जून को जारी एक बयान में कहा कि नीलाविलक्कू जलाने की प्रथा लंबे समय से गैर-मुसलमानों द्वारा एक विशिष्ट धार्मिक समारोह के रूप में प्रचलित है और मुसलमानों से सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखते हुए ऐसे मामलों में सावधानी बरतने का आग्रह किया।
विवाद के बीच, समस्त नेता अब्दुल हमीद फैजी अंबलक्कडावु ने शुक्रवार को फेसबुक पर एक पोस्ट साझा किया जिसमें इस मुद्दे पर संगठन का रुख स्पष्ट किया गया था।
उन्होंने कहा, "इस्लामी कानून सटीक, स्पष्ट और विस्तृत हैं। इस्लाम अपने अनुयायियों को अन्य धर्मों के अनुयायियों के प्रति मित्रता और सहिष्णुता दिखाने का सख्त निर्देश देता है। पैगंबर के साथी अपने परिवारों को निर्देश देते थे कि जब बकरी को जिबह करके पकाया जाए, तो उसका पहला हिस्सा किसी यहूदी पड़ोसी को दिया जाए।"
उन्होंने आगे कहा, "हालांकि, इस्लाम ने अन्य धर्मों के अनुष्ठानों का पालन करने और उनका अभ्यास करने पर कड़ा प्रतिबंध लगाया है।"
फैजी ने कहा कि इस तरह के मुद्दे अक्सर बहुलतावादी समाज में विवादास्पद हो जाते हैं और उन्होंने यह भी बताया कि कुछ लोग इस आधार पर ऐसी प्रथाओं में भाग लेने को उचित ठहराते हैं कि वे संबंधित धार्मिक मान्यताओं को नहीं मानते हैं।
उन्होंने कहा, "इस मुद्दे पर, केरल के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस्लामी विद्वानों के आधिकारिक निकाय ने एक धार्मिक फैसला जारी किया है, जिसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।"
कोझिकोड में तीन जून को आयोजित समस्त केरल जमीयतुल उलेमा की केंद्रीय मुशावारा बैठक द्वारा जारी एक बयान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि संस्था ने मुसलमानों से उन समारोहों और प्रथाओं से बचने का आह्वान किया है जिनका इस्लाम में कोई आधार नहीं है और जिन्हें अन्य धर्मों के अनुयायी अपने धार्मिक अनुष्ठानों के हिस्से के रूप में करते हैं।
बयान में कहा गया, "नीलाविलक्कू विवाद को लेकर चल रही चर्चाओं के दौरान यह निर्णय लिया गया। कुछ विशेष परिस्थितियों में, गैर-मुसलमानों द्वारा नीलाविलक्कू जलाने की प्रथा को एक विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान के रूप में लंबे समय से अपनाया जाता रहा है। यदि कोई मुसलमान इस प्रकार की प्रथा में उन मान्यताओं को स्वीकार करते हुए और उन मान्यताओं के आधार पर भाग लेता है जो इस अनुष्ठान को करने वालों द्वारा इस्लाम के विरुद्ध मानी जाती हैं, तो ऐसा करना इस्लाम से विमुख होने के समान होगा।"
इसमें कहा गया, "दूसरी ओर, यदि ऐसा बिना किसी मान्यता को स्वीकार किए या उस पर आधारित किए बिना किया जाता है, बल्कि केवल गैर-मुसलमानों के समान दिखने के कार्य के रूप में किया जाता है, तो यह कार्य निषिद्ध और पापपूर्ण है।"
बयान में हालांकि स्पष्ट किया गया कि निलाविलक्कू का उपयोग केवल प्रकाश के स्रोत के रूप में करना उचित है।
इसमें कहा गया, "यदि कोई व्यक्ति निलाविलक्कू को केवल प्रकाश के लिए जलाता और उपयोग करता है, ठीक उसी तरह जैसे किसी अन्य दीपक का उपयोग प्रकाश प्राप्त करने के साधन के रूप में किया जाता है, तो यह जायज है।"
भाषा प्रशांत नरेश
नरेश
0506 1722 कोझिकोड