न्यायालय ने धारा 354 के तहत लगे आरोप हटाने के खिलाफ दायर याचिका पर एचडी रेवन्ना से जवाब मांगा
सुरेश
- 13 Jul 2026, 03:18 PM
- Updated: 03:18 PM
नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय सोमवार को कर्नाटक सरकार की उस याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हो गया जिसमें जनता दल (सेक्युलर) नेता एवं विधायक एचडी रेवन्ना के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने के आरोप को खारिज किये जाने के उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है।
यह मामला रेवन्ना की पूर्व घरेलू सहायिका ने दर्ज कराया था।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने एच डी रेवन्ना को नोटिस भी जारी किया और उनके वकील से राज्य सरकार की याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करने को कहा।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कर्नाटक सरकार से भी सवाल किया कि जब उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत आरोप निरस्त किए थे, तब सरकार ने उस आदेश को चुनौती क्यों नहीं दी? साथ ही पीठ ने सरकार से कुछ अनुशासन बनाए रखने को भी कहा।
पीठ ने इस बात का संज्ञान लिया कि एक घरेलू सहायिका ने एच डी रेवन्ना और प्रज्वल रेवन्ना (पिता-पुत्र की जोड़ी) पर कई तरह के आरोप लगाए हैं।
एच डी रेवन्ना पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के बेटे और जेल में बंद पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना के पिता हैं।
एच डी रेवन्ना केंद्रीय मंत्री एच डी कुमारस्वामी के छोटे भाई हैं।
एच डी रेवन्ना पर यौन उत्पीड़न के आरोप तब सामने आए, जब उनके बेटे और हासन के पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ बलात्कार और यौन शोषण के कई मामले दर्ज किए गए।
एच डी रेवन्ना पर यौन उत्पीड़न का आरोप उस वक्त सामने आया जब उनके बेटे और हासन के पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ दुष्कर्म और यौन शोषण के कई मामले दर्ज किए गए।
प्रज्वल मामले में विभिन्न शिकायतकर्ताओं में शामिल एक पीड़िता ने एच डी रेवन्ना पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए।
प्रज्वल को उनके खिलाफ दर्ज चार मामलों में से एक में पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है।
प्रज्वल के खिलाफ मामले तब सामने आए जब 26 अप्रैल 2024 को हासन में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कथित तौर पर उनसे जुड़ी अश्लील वीडियो सामग्री वाली वाली पेन-ड्राइव वहां वितरित की गई।
पिछले साल 19 नवंबर को उच्च न्यायालय ने एच डी रेवन्ना के खिलाफ महिला की मर्यादा भंग करने (भारतीय दंड संहिता की धारा 354) के आरोप को तो रद्द कर दिया, लेकिन धारा 354ए के तहत यौन उत्पीड़न के आरोप को बरकरार रखा। उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अदालत को यह जांचने का निर्देश दिया कि क्या शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 468 के तहत माफ किया जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने पाया कि शिकायत में बताई गई बातें भारतीय दंड संहिता की धारा 354ए के तहत यौन उत्पीड़न के अपराध से मेल खाती हैं, न कि धारा 354 के तहत अधिक गंभीर आरोप से।
रेवन्ना ने प्राथमिकी रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि शिकायत तीन साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए लागू तीन साल की समय-सीमा के बाद दर्ज की गई थी।
उच्च न्यायालय के आदेश के बाद पिछले साल 29 दिसंबर को अधीनस्थ अदालत ने 2024 में दर्ज यौन उत्पीड़न के मामले में एच. डी. रेवन्ना को आरोपमुक्त कर दिया था।
भाषा संतोष सुरेश
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