न्यायालय ने भोजशाला मामले में अलग खुली जगह पर नमाज की व्यवस्था के दिए निर्देश
सुरेश
- 14 Jul 2026, 09:18 PM
- Updated: 09:18 PM
नयी दिल्ली, 14 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि भोजशाला मामले की ''संवेदनशील'' प्रकृति को देखते हुए हिंदू और मुस्लिम, दोनों पक्षों को धैर्य रखना चाहिए। न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया कि फैसला होने तक परिसर के निकट मुस्लिम समुदाय को हर शुक्रवार को अपराह्न एक बजे से तीन बजे के बीच नमाज अदा करने के लिए अलग से एक खुला स्थान उपलब्ध कराया जाए।
न्यायालय ने कहा कि वह इस मामले की रोजाना आधार पर सुनवाई करने और मुद्दे का समाधान निकालने के लिए तैयार है। शीर्ष अदालत ने मुस्लिम पक्ष की उन अपीलों पर विचार किया, जिनमें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती दी गई है। उस आदेश में कहा गया था कि विवादित भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है।
उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अप्रैल 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें हिंदुओं को मंगलवार को पूजा-अर्चना करने और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज़ अदा करने की इजाजत दी गई थी।
हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष 11वीं सदी की इस संरचना को कमाल मौला मस्जिद बताता है। इस विवादित परिसर की देखरेख एएसआई करता है।
हालांकि, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम समुदाय के लिए की गई यह व्यवस्था केवल तदर्थ (एड-हॉक) होगी और यह इस मामले में लंबित याचिकाओं के निर्णय पर निर्भर करेगी।
शीर्ष अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि एएसआई विवादित परिसर में अदालत की अनुमति के बिना किसी प्रकार का संरचनात्मक परिवर्तन नहीं करेगा।
मुस्लिम पक्ष की याचिका स्वीकार करते हुए, शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार, एएसआई और अन्य को नोटिस जारी किया।
न्यायालय ने कहा, ''ये बहुत ही संवेदनशील मामले हैं और दोनों पक्षों को धैर्य रखना चाहिए। अदालत में जो कुछ भी कहा जा रहा है, उससे बेवजह विवाद पैदा हो सकते हैं या गलत संदेश जा सकता है। हमें उपयोग किये जाने वाले हर शब्द को लेकर बहुत सावधान रहना होगा।''
शीर्ष अदालत ने कहा, ''अंतरिम व्यवस्था से जुड़ा यह मुद्दा पहली बार हमारे समक्ष आया है। हम उच्च न्यायालय के आदेश और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में राज्य सरकार के समक्ष पेश आ रही मुश्किलों का भी संज्ञान ले रहे हैं।''
प्रधान न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी में कहा, ''हमारा मानना है कि फिलहाल जो व्यवस्था लागू है, उसे यथावत बनाए रखा जाए। इस मामले को 10 से 15 दिनों के भीतर उपयुक्त पीठ के समक्ष सुनवाई के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सकता है।''
सुनवाई के दौरान, मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि उच्च न्यायालय का आदेश त्रुटिपूर्ण था और दलील दी कि इससे लगभग 800 वर्षों से चली आ रही यथास्थिति में बदलाव आया है।
अहमदी ने कहा कि 2003 से चली आ रही व्यवस्था, जिसके तहत हिंदू और मुस्लिम निर्धारित दिनों पर उस जगह पर उपासना कर सकते थे, उसे इस समय जारी रहने दिया जाना चाहिए।
मुस्लिम पक्ष की ओर से ही पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि उपलब्ध सबूतों के अनुसार, उस जगह पर कम से कम 700 वर्षों से नमाज़ अदा की जा रही थी। यह ''साम्प्रदायिक सद्भाव'' का एक बेहतरीन उदाहरण था क्योंकि वहां हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को ही उपासना करने की इजाजत थी।
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को बताया कि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद कई घटनाक्रम हुए हैं।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 15 मई के अपने फैसले में कहा था कि धार जिला स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है। साथ ही अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कई दशक पुराने उस आदेश को भी रद्द कर दिया था, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को इस परिसर में शुक्रवार की नमाज़ अदा करने की अनुमति दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि केंद्र और एएसआई भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन के बारे में निर्णय ले सकते हैं।
मुस्लिम पक्ष ने उच्च न्यायालय के फैसले के ख़िलाफ शीर्ष अदालत में अपील दायर की है।
हिंदू पक्षोकारों ने उच्चतम न्यायालय में 'कैविएट' दायर की है, जिसमें कहा गया है कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर उनका पक्ष सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।
'कैविएट' याचिका तब दायर की जाती है, जब इस बात की आशंका हो कि दूसरा पक्ष अदालत से उसके खिलाफ कोई आदेश लेने की कोशिश कर सकता है।
भाषा सुभाष सुरेश
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