सर्जरी से प्रसव के बाद महिलाओं ने 48 घंटे के भीतर किडनी प्रतिरोपण की मांग की, मुर्मू को लिखा पत्र
अविनाश
- 15 Jul 2026, 10:20 PM
- Updated: 10:20 PM
कोटा, 15 जुलाई (भाषा) गर्भवती महिलाओं को उम्मीद होती है कि प्रसव के दो दिन बाद अस्पताल से उन्हें छुट्टी मिल जाएगी और वे गोद में अपने नवजात शिशु को लेकर खुशी-खुशी घर जाएंगी।
हालांकि कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एनएमसीएच) में सर्जरी से प्रसव कराने वाली पांच महिलाएं किडनी में संक्रमण का शिकार हो गईं और गंभीर समस्या से जूझते हुए लगातार इलाज और डायलिसिस पर निर्भर हैं।
मोहन लाल की पत्नी धन्नी सुमन मई के पहले सप्ताह से अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने कहा कि अब धन्नी डायलिसिस शब्द से ही डर जाती हैं।
अस्पताल में 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में मोहन लाल ने कहा, '' डायलिसिस शुरू होने के एक घंटे के भीतर ही उसे उल्टी होने लगती है, खूब कंपकंपी आती है और तेज बुखार हो जाता है। उन दिनों वह कुछ खा भी नहीं पाती।''
इन महिलाओं को पिछले 68 दिनों में 32 बार डायलिसिस कराना पड़ा है। वहीं, न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में सर्जरी से प्रसव के बाद हुई जटिलताओं के कारण पांच अन्य महिलाओं की मौत भी हो चुकी है।
बुधवार को इन पांच महिलाओं के परिजनों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि अगर उनका किडनी प्रतिरोपण नहीं होता है, तो उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।
उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को स्पीड पोस्ट के जरिए भेजे गए ज्ञापन में यह अनुरोध किया।
यह कदम तब उठाया गया, जब पांचों महिलाओं ने डायलिसिस कराने से इनकार कर दिया और किडनी प्रतिरोपण या मौत की मांग पर अड़ी रहीं।
प्रभावित महिलाओं के परिवारों ने सोमवार को जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर किडनी प्रतिरोपण के लिए निश्चित समयसीमा तय करने की मांग की। परिवारों ने प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है।
मोहन लाल ने कहा, '' हम उन्हें इस तरह और पीड़ा में नहीं देख सकते। अगर 48 घंटे के भीतर किडनी प्रतिरोपण के लिए लिखित आश्वासन नहीं दिया गया, तो हम उन्हें डायलिसिस के लिए लाना बंद कर देंगे और उन्हें मरने के लिए छोड़ देंगे। हम जिंदा लाश बन गए हैं।''
एनएमसीएच के प्राचार्य डॉ. नीलेश जैन ने बुधवार को दावा किया कि किडनी संबंधी जटिलताओं से जूझ रहीं पांचों नवप्रसूता की हालत पूरी तरह स्थिर है और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी जा सकती है।
उन्होंने बताया कि ये महिलाएं पिछले 20 दिनों से घर जाने के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट हैं और बाह्य रोगी (ओपीडी) के रूप में भी डायलिसिस करा सकती हैं।
जैन ने जोर देकर कहा कि हर दिन कम से कम 80 मरीज नियमित डायलिसिस कराते हैं और सभी इसके लिए अस्पताल आते हैं।
उन्होंने मरीजों द्वारा डायलिसिस कराने से इनकार किए जाने पर कहा कि अगर वे डायलिसिस नहीं कराएंगी, तो शरीर में विषैले अपशिष्ट जमा होने लगेंगे, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
जैन ने बताया कि अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो अस्पताल आवश्यक हस्तक्षेप के लिए इस मामले की औपचारिक सूचना जिला प्रशासन को देगा।
प्राचार्य ने किडनी प्रतिरोपण के बारे में कहा कि जब गुर्दे बड़ी तेजी से काम करना बंद करते हैं तो इन मामले में किसी मरीज को तीन से छह महीने तक निगरानी में रखा जाता है।
उन्होंने बताया कि इस समय किडनी प्रतिरोपण की बात करना जल्दबाजी होगी।
एक अन्य महिला 29 वर्षीय रागिनी मीणा अब पूरी तरह डायलिसिस पर निर्भर हैं। उनके भाई विकास ने कहा, '' मेरी बहन यहां बच्चे को जन्म देने आई थी और उसे लगा था कि सिर्फ दो दिन में घर लौट जाएगी। आज स्थिति यह है कि वह डायलिसिस के बिना 24 घंटे भी जीवित नहीं रह सकती। हर 48 घंटे में उसे यह प्रक्रिया करवानी पड़ती है।''
विकास के अनुसार रागिनी के पति लोकेश एक फाइनेंस कंपनी में काम करते थे लेकिन उनकी नौकरी चली गई है और परिवार पूरी तरह उधार के पैसों पर निर्भर है।
कैब चालक मोहन लाल को भी अपनी पत्नी के इलाज और अस्पताल में रहने के खर्च के लिए अपनी रोजी-रोटी का एकमात्र साधन अपनी टैक्सी बेचनी पड़ी।
उन्होंने कहा, ''खर्च पूरा करना असंभव हो गया था। मुझे अपनी टैक्सी बेचनी पड़ी। अब वह पैसा भी लगभग खत्म हो चुका है।''
उनके बच्चे का जन्म आठ मई को हुआ था और इस वक्त एक रिश्तेदार उनकी देखरेख कर रहे हैं। उनके दो अन्य बच्चे हैं जिनकी उम्र 5 और 10 साल हैं, वे घर पर अपनी दादी के साथ हैं।
पीड़ित महिला पिंकी के पति नरेश ने आरोप लगाया कि सरकार ने महिलाओं और उनके परिवारों की पीड़ा से आंखें मूंद ली हैं। उन्होंने बताया कि जेके लोन अस्पताल में आठ मई को जन्मे उनके बच्चे की प्रसव के तुरंत बाद मौत हो गई थी।
नरेश ने संक्रमण के कारण जान गंवाने वाली महिलाओं के परिवारों को लोकसभा अध्यक्ष और स्थानीय सांसद ओम बिरला द्वारा दी गई पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता का जिक्र करते हुए कहा, ''ऐसा लगता है जैसे एक इंसानी जिंदगी की कीमत सिर्फ इतनी ही है।''
उन्होंने सवाल किया, ''लेकिन उन लोगों का क्या जो बीच में फंसे हुए हैं, जो हर दिन धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रहे हैं?''
प्रभावित परिवारों में आरती चोपदार और सुशीला महावर के परिवार भी शामिल हैं। उन्होंने राज्य सरकार से जवाबदेही तय करने और तत्काल जीवनरक्षक कदम उठाने की मांग की है।
जिला प्रशासन और न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अधिकारियों ने फोन कॉल और संदेशों का जवाब नहीं दिया।
राजस्थान सरकार ने कोटा के अस्पतालों में प्रसव के बाद हुई जटिलताओं की जांच के आदेश दिए हैं। जांच में कुछ ऐसी दवाएं मिलीं जिनकी गुणवत्ता खराब थीं लेकिन प्रसव के बाद हुई समस्याओं से उनका सीधा संबंध नहीं पाया गया।
राजस्थान के बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा से भी मातृ मृत्यु के मामले सामने आए हैं।
भाषा जितेंद्र अविनाश
अविनाश
1507 2220 कोटा