यदि स्थानीय समुदाय होंगे हिस्सेदार तो वन संरक्षण प्रयास होंगे असरदार एवं दीर्घकालिक: द्रौपदी मुर्मू
अविनाश
- 17 Jul 2026, 06:34 PM
- Updated: 06:34 PM
नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शुक्रवार को कहा कि समाज को वनों की सुरक्षा के कार्य में भागीदार बनाने से संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी एवं दीर्घस्थायी बनेंगे।
राष्ट्रपति मुर्मू ने यहां राष्ट्रपति भवन में भारतीय वन सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी प्रगति, जनसांख्यिकीय बदलाव और बढ़ती आकांक्षाएं उनके सामने नयी चुनौतियां पेश करती रहेंगी।
उन्होंने कहा, ''अधिकारियों के तौर पर आपको हालात के हिसाब से ढलने वाला और भविष्य की सोच रखने वाला होना चाहिए। आपको लगातार सीखते रहना चाहिए और नयी सोच को अपनाना चाहिए तथा संवैधानिक मूल्यों से भी मजबूती से जुड़े रहना चाहिए।''
राष्ट्रपति ने उनसे संरक्षण, वन-पुनर्स्थापन तथा सतत आजीविका से जुड़ी पहल में जनभागीदारी को बढ़ावा देने का भी आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदायों, वनवासियों, महिलाओं, किसानों तथा स्थानीय संस्थाओं के विचारों और चिंताओं को समझने से अधिकारियों को बहुमूल्य दृष्टिकोण प्राप्त होगा। उन्होंने कहा कि समाज को वनों की सुरक्षा के कार्य में भागीदार बनाने से संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी एवं दीर्घस्थायी बनेंगे।
मुर्मू ने कहा, ''स्थानीय लोगों के पारंपरिक ज्ञान ने पीढ़ियों से जंगलों को बचाकर रखा है। आपको प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच भरोसा कायम करना चाहिए।''
राष्ट्रपति ने कहा कि वन सेवा के अधिकारियों की ज़िम्मेदारिया सिर्फ संरक्षण तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने कहा, ''जंगलों में और उनके आस-पास रहने वाले लोगों की वैध आकांक्षाओं और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच तालमेल जरूरी है। विकास और संरक्षण को एक-दूसरे के विरोधी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। आपको ऐसे समाधानों पर काम करना चाहिए जिनसे प्रकृति और समुदाय, दोनों एक साथ फल-फूल सकें।''
राष्ट्रपति ने अधिकारियों से कहा कि वे न केवल वनों के प्रशासक हैं, बल्कि भारत की प्राकृतिक धरोहर के संरक्षक भी हैं।
उन्होंने कहा, ''आज आपकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। दुनिया जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता के नुकसान जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इन चुनौतियों से निपटने में वन केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।''
भाषा राजकुमार अविनाश
अविनाश
1707 1834 दिल्ली