मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने यूसीसी विधेयक के मसौदे को मंजूरी दी : मुख्यमंत्री मोहन यादव
दिलीप
- 19 Jul 2026, 04:37 PM
- Updated: 04:37 PM
भोपाल, 19 जुलाई (भाषा) मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने रविवार को तीन तलाक या निकाह हलाला से जुड़े मामलों को अपराध की श्रेणी में रखने, एक से अधिक शादी पर रोक लगाने, शादी और तलाक दोनों का पंजीयन अनिवार्य करने तथा विवाहित या अविवाहित माता-पिता के जैविक या गोद लिए जाने सहित सभी प्रकार के बच्चों को उत्तराधिकार में समान कानूनी दर्जा देने वाले 'मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता 2026' विधेयक को मंजूरी दे दी।
राजधानी भोपाल के बाहरी इलाके में स्थित जगदीशपुर (पूर्व में इस्लामपुर) में आयोजित मंत्रिमंडल की विशेष बैठक में इस विधेयक को मंजूरी मिलने के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य में अब 'राम और रहीम', सबके लिए एक जैसा कानून होगा। हालांकि, आदिवासी समुदाय को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगा।
मुख्यमंत्री ने यूसीसी को भारत के संविधान में निहित समानता, बराबरी, न्याय और धर्मनिरपेक्षता की दृष्टि को साकार करने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम करार दिया तथा कहा कि इस संहिता का मुख्य मकसद पर्सनल कानूनों के तहत महिलाओं के साथ होने वाले पुराने भेदभाव को खत्म करना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें सशक्त बनाना है।
उन्होंने कहा कि पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार देने के साथ-साथ यह संहिता उन धार्मिक रीति-रिवाजों और पारंपरिक प्रथाओं की साफ तौर पर सुरक्षा करता है, जो सार्वजनिक नैतिकता और नीति के अनुरूप हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड, गुजरात और असम में लागू यूसीसी के गहन अध्ययन और उनके मार्गदर्शन से मध्यप्रदेश यूसीसी विधेयक को तैयार किया गया है।
बैठक में यूसीसी के अलावा श्रम संहिता, निजी विश्वविद्यालय संशोधन, नागरिक सुरक्षा और व्यवसाय की सुगमता से जुड़े विधेयकों को भी स्वीकृति दी गई।
यादव ने कहा कि यूसीसी सहित उपरोक्त विधेयकों को 20 जुलाई से शुरू हो रहे राज्य विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए गठित समिति के समक्ष करीब 80 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने, जबकि 40 प्रतिशत मुस्लिम पुरुषों ने इस विधेयक का समर्थन किया।
मुख्यमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से सामाजिक समरसता, महिला सशक्तीकरण और राष्ट्रीय एकता की मजबूती के लिए लाए जा रहे इस विधेयक का दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन देने का आह्वान किया।
यादव ने कहा कि समिति के समक्ष भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और वाम दलों ने अपना पक्ष रखा, लेकिन हर विषय को हिंदू-मुस्लिम और वोट बैंक के नजरिए से देखने वाली कांग्रेस इससे दूर रही।
उन्होंने कहा कि यूसीसी सभी समुदायों में केवल एक ही शादी को अनिवार्य बनाता है और कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विधेयक के तहत अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है और मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है।
उन्होंने कहा कि इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है।
उन्होंने कहा कि विधेयक में मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है।
उन्होंने कहा कि इस विधेयक के तहत लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है।
उन्होंने कहा कि इसके तहत तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए 'निकाह हलाला' जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय अपराध माना जाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विधेयक के कानून का स्वरूप लेने के बाद विवाहित या अविवाहित माता-पिता के बच्चों, जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) से पैदा हुए सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा प्राप्त होगा।
उन्होंने कहा कि कस्टडी से जुड़े किसी भी विवाद में माता-पिता के अधिकारों के मुकाबले 'बच्चे का हित और सर्वांगीण भलाई' ही अदालत के फैसले का मुख्य और अनिवार्य आधार होगी।
विधेयक में बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं, चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो।
इसके साथ ही विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास 'लिव-इन रिलेशनशिप का बयान' जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि विधेयक में 'लिव-इन' से पैदा हुए बच्चों को वैध दर्जा दिए जाने का प्रावधान किया गया है।
उन्होंने कहा कि इसके तहत यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है।
विधेयक में बिना पंजीकरण के एक महीने से ज्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 रुपये जुर्माने का; गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 रुपये जुर्माने का तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 रुपये के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
ज्ञात हो कि न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में यूसीसी का मसौदा तैयार करने के समिति गठित की गई थी, जिसने पिछले दिनों मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी थी।
भाषा ब्रजेन्द्र
रवि कांत दिलीप
दिलीप
1907 1637 भोपाल