अपार सहमति-पत्र पर ओडिशा उच्च न्यायालय का फैसला देशभर में लागू करे सीबीएसई : उच्चतम न्यायालय
सुरेश
- 20 Jul 2026, 05:42 PM
- Updated: 05:42 PM
नयी दिल्ली, 20 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को ओडिशा उच्च न्यायालय के उस निर्देश को पूरे देश में लागू करने का आदेश देगा, जिसमें 'ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री (अपार) आईडी जारी करने के लिए सहमति-पत्र में अभिभावकों को सहमति देने से इनकार करने या इस योजना से बाहर रहने का विकल्प देने का प्रावधान करने को कहा गया है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत शिक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू की गई अपार (एपीएएआर) योजना के तहत प्रत्येक छात्र को 12 अंकों की एक विशिष्ट और आजीवन मान्य पहचान संख्या दी जाती है। यह सभी शैक्षणिक रिकॉर्ड के एक डिजिटल भंडार के तौर पर काम करता है, जिसमें अंकपत्र, डिग्री और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों से जुड़ी उपलब्धियां एक ही स्थान पर सुरक्षित रखी जाती हैं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ चार छात्रों के अभिभावकों की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें यह कहते हुए विद्यार्थियों के लिए अपार आईडी योजना की वैधता को चुनौती दी गई है कि यह उन्हें आधार पहचानपत्र प्राप्त करने के लिए बाध्य करती है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि केंद्र सरकार ने ओडिशा उच्च न्यायालय के दिसंबर, 2025 के फैसले को चुनौती नहीं दी है, इसलिए वह सीबीएसई को इस फैसले को पूरे देश में लागू करने का निर्देश देगी।
पीठ ने कहा, ''हम सीबीएसई को यह फैसला पूरे देश में लागू करने का निर्देश देंगे, क्योंकि उच्च न्यायालय के आदेश को स्वीकार कर लिया गया है। साथ ही, सीबीएसई से इन मुद्दों पर भी गौर करने को कहा जाएगा।''
पीठ ने कहा कि औपचारिक आदेश बाद में जारी किया जाएगा।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वह सीबीएसई को याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई सहमति और डेटा संरक्षण से जुड़ी चिंताओं के समाधान करने का निर्देश देगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सरकार 'अपार' योजना को स्वैच्छिक बताती है, लेकिन व्यवहार में बच्चों को इसमें शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि योजना को वैकल्पिक बताया गया है, लेकिन इसे आधार से जोड़ दिया गया है, ऐसे में 'अपार' आईडी लेने के लिए पहले आधार पहचानपत्र बनवाना लगभग अनिवार्य हो जाता है।
उन्होंने ''के.एस. पुट्टास्वामी'' मामले में 2019 के आधार संबंधी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों को आधार बनवाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता तथा परीक्षा में बैठने के लिए 'अपार' को जरूरी बनाना उसी सिद्धांत का उल्लंघन है।
जयसिंह ने कहा, ''शिक्षा का अधिकार संवैधानिक अधिकार है। किसी बच्चे से परीक्षा देने के लिए आधार और 'अपार' बनवाने को कहना संविधान के खिलाफ है।''
उन्होंने कहा कि योजना का क्रियान्वयन डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023, के अनुरूप नहीं है, खासकर सूचित सहमति, सहमति वापस लेने और विद्यार्थियों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के मामले में।
जयसिंह ने कहा कि मौजूदा सहमति-पत्र एक सामान्य अनुबंध जैसा है, जिसमें अभिभावकों को सहमति देने से इनकार करने या पंजीकरण से पहले ही योजना से बाहर रहने का कोई वास्तविक विकल्प नहीं दिया गया है।
उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि वह सीबीएसई और विद्यालयों को अभिभावकों की सहमति लेते समय डीपीडीपी अधिनियम की धारा-छह का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दे।
उन्होंने बच्चों के शैक्षणिक रिकॉर्ड लंबे समय तक सुरक्षित रखने को लेकर भी चिंता जतायी और कहा कि व्यक्तियों को "राइट टू बी फॉरगॉटन" (रिकॉर्ड से नाम हटवाने का अधिकार) और अपनी सहमति वापस लेने का अधिकार होना चाहिए।
हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने योजना को व्यापक तौर पर चुनौती दिए जाने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य हर छात्र को एक विशिष्ट शैक्षणिक पहचान देना और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना है। उन्होंने कहा, "देश में हर चीज को संदेह की नजर से नहीं देखना चाहिए। यह एक स्वागतयोग्य कदम है।"
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह विशिष्ट पहचान संख्या शिक्षा प्राधिकारियों को छात्रों का सही रिकॉर्ड रखने, पाठ्यक्रम लागू करने और शिक्षक-छात्र अनुपात जैसे मानकों की निगरानी करने में मदद करेगी।
जयसिंह ने कहा कि योजना का उद्देश्य उचित हो सकता है, लेकिन उसे वैधता, आवश्यकता और आनुपातिकता जैसे संवैधानिक मानकों पर भी खरा उतरना होगा।
पीठ ने कहा कि सीबीएसई के परिपत्र डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम के अधीन रहेंगे और वे लागू कानूनी व्यवस्था का अतिक्रमण नहीं कर सकते।
याचिकाकर्ताओं ने ओडिशा उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को अभिभावकों को 'अपार' के लिए सहमति देने से इनकार करने और योजना से बाहर रहने का स्पष्ट विकल्प देने का निर्देश दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि सहमति-पत्र में योजना से बाहर रहने का विकल्प नहीं होने से सरकार का यह दावा कमजोर पड़ता है कि 'अपार' योजना पूरी तरह स्वैच्छिक है। अदालत ने कहा था कि इससे निजता के मौलिक अधिकार को लेकर भी उचित चिंताएं पैदा होती हैं।
उच्च न्यायालय ने यह भी दोहराया था कि शिक्षा को आधार से नहीं जोड़ा जा सकता। उसने कहा था कि बाद में सहमति वापस लेने का अधिकार, शुरुआत में सहमति देने से इनकार करने के अधिकार का विकल्प नहीं हो सकता।
अभिषेक बक्सी द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका में 'अपार' (एपीएएआर) योजना को असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में कहा गया है कि आधार से जुड़ी शैक्षणिक पहचान प्रणाली और उससे संबंधित डेटा प्रसंस्करण व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 21(ए) का उल्लंघन करती है तथा केंद्र सरकार की कार्यपालिका शक्तियों की सीमा से परे है।
भाषा अमित सुरेश
सुरेश
2007 1742 दिल्ली