पैलेट गन के इस्तेमाल का मामला: न्यायालय ने आरएएफ के हथियारों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने को कहा
सिम्मी
- 30 Jul 2026, 02:07 PM
- Updated: 02:07 PM
नयी दिल्ली, 30 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हाल में दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट गन के इस्तेमाल से संबंधित याचिका पर संज्ञान लेते हुए उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को जंतर-मंतर पर तैनात द्रुत कार्य बल (आरएएफ) के हथियारों के उपयोग का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का बृहस्पतिवार को निर्देश दिया।
न्यायालय ने कहा कि पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (बीपीआरएंडडी) की परामर्शिका के अनुसार, पुलिस को असाधारण परिस्थितियों में पैलेट गन का इस्तेमाल करने का अधिकार है। न्यायालय ने इस आधार पर पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने संबंधी याचिका में किए गए अनुरोध को ''अस्पष्ट'' करार दिया।
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर की दलीलों पर गौर किया और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि 20 जुलाई को यहां हुए प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से घायल हुए प्रशांत कुमार, शेख इरशाद मंसूरी तथा अन्य घायलों को सर्वोत्तम उपचार उपलब्ध कराया जाए।
पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी यशोवर्धन आजाद तथा पैलेट गन से घायल दो व्यक्तियों ने कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए धातुयुक्त पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अनुरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया है।
सुनवाई की शुरुआत में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अनुरोध ''अस्पष्ट'' है, क्योंकि याचिका में उन पुलिस नियमों को चुनौती नहीं दी गई है जो ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि ऐसे नियम सार्वजनिक रूप से आसानी से उपलब्ध नहीं हैं और उन्होंने पीठ से केंद्र सरकार को उन्हें अदालत के रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश देने का अनुरोध किया।
ऐसी जानकारी है कि सिंह और मंसूरी को 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) द्वारा आयोजित 'संसद चलो' मार्च के दौरान पैलेट लगने से चोटें आई थीं।
ग्रोवर ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के मामले में धातुयुक्त पैलेट का इस्तेमाल किया गया था और ये पैलेट उनके शरीर से निकाले गए।
उन्होंने कहा, ''मैं यह नहीं कह रही हूं कि आरएएफ के शस्त्रागार में पैलेट गन नहीं होनी चाहिए। यहां मामला अलग है। यहां धातुयुक्त पैलेट का इस्तेमाल किया गया है।''
पीठ ने कहा कि वह किसी विशेष घटना में पैलेट के इस्तेमाल की वैधता की जांच करने के लिए तैयार है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना होगा कि उस स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनाई जाने वाली 'क्रमिक प्रतिक्रिया' के तहत पैलेट का इस्तेमाल अनुमत था या नहीं।
इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि उनकी राहत की मांग केवल धातुयुक्त पैलेट के इस्तेमाल तक सीमित है।
उन्होंने कहा, ''दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई स्थायी आदेश नहीं है जो पैलेट के इस्तेमाल की अनुमति देता हो। यही मेरी कठिनाई है और इसी कारण मुझे पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (बीपीआरएंडडी) की परामर्शिका पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यदि ऐसा कोई स्थायी आदेश है तो केंद्र सरकार उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। मुझे पूरा विश्वास है कि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस निर्दोष युवाओं पर पैलेट नहीं चलाना चाहेंगी।''
ग्रोवर ने कहा, ''मुझे दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई स्थायी आदेश नहीं मिला।''
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पीठ की सहायता के लिए जो भी आवश्यक होगा, सरकार वह करेगी।
ग्रोवर ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 28 जुलाई को सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी कैमरा फुटेज और वायरलेस लॉग सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था, लेकिन उसने विशेष रूप से आरएएफ के हथियारों के उपयोग के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का उल्लेख नहीं किया था।
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ''जांच के लिए जो भी आवश्यक होगा, उसे सुरक्षित रखा जाएगा।''
पीठ ने कहा कि कोई भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन किसी भी समय हिंसक रूप ले सकता है, संभव है कि उसमें असामाजिक तत्व घुसपैठ कर जाएं तो ऐसी स्थिति में कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा क्रमिक प्रतिक्रिया अपनाना कभी-कभी आवश्यक हो सकता है।
इस पर विधि अधिकारी ने कहा कि बलों को घटनास्थल पर मौजूद परिस्थितियों के आधार पर तत्काल निर्णय लेना पड़ सकता है।
यशोवर्धन आजाद ने देशभर में नागरिकों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए 'पंप-एक्शन' अथवा 'प्रोजेक्टाइल-एक्शन' गन से दागी जाने वाली पूरी तरह या आंशिक रूप से धातुयुक्त पैलेट गोलियों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया है। उनका कहना है कि ऐसे हथियार बल प्रयोग से संबंधित संवैधानिक मानकों के मूलतः प्रतिकूल हैं।
याचिका में घटना में कथित रूप से घायल हुए सभी लोगों को उचित मुआवजा, समुचित उपचार और पुनर्वास की सुविधा मुहैया कराने का भी अनुरोध किया गया है।
याचिका के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान भीड़ से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस की सहायता के लिए तैनात आरएएफ ने पहले आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया। इसके बाद कनॉट प्लेस के निकट धातुयुक्त पैलेट से भरी पंप-एक्शन बंदूकें चलाईं।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बल प्रयोग बढ़ाने से पहले न तो कोई पूर्व चेतावनी दी गई और न ही कोई सार्वजनिक घोषणा की गई जिसके कारण कई प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हुए। इनमें आंखों में चोट लगने के मामले भी शामिल हैं।
याचिका में कहा गया है कि पैलेट गन को भले ही अक्सर ''कम घातक'' हथियार बताया जाता है, लेकिन इससे बड़ी संख्या में पैलेट व्यापक क्षेत्र में फैल जाते हैं। इस कारण इन्हें किसी एक व्यक्ति पर सटीक रूप से निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और इससे आंखों तथा शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों में गंभीर चोट लगने का बड़ा खतरा रहता है।
भाषा गोला सिम्मी
सिम्मी
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