संसदीय समिति ने सरकार से 'ध्रुवीय राजदूत' नियुक्त करने पर विचार करने की सिफारिश की
माधव
- 31 Jul 2026, 01:48 PM
- Updated: 01:48 PM
नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) संसद की एक स्थायी समिति ने केंद्र सरकार से 'ध्रुवीय राजदूत' नियुक्त करने पर विचार करने की सिफारिश करते हुए कहा है कि इस तरह का पद सृजित करने से भारत अपनी विदेश नीति में आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों के महत्व को बेहतर तरीके से प्रदर्शित कर सकेगा तथा 'ध्रुवीय राजनय' को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
कांग्रेस नेता शशि थरूर की अध्यक्षता वाली विदेश मामलों की स्थायी संसदीय समिति ने संसद में बृहस्पतिवार को पेश अपनी रिपोर्ट 'आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में भारत की भूमिका और उपस्थिति' में यह सिफारिश की है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि आर्कटिक क्षेत्र के अधिकांश संसाधन संप्रभु देशों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और इसे 'वैश्विक साझा संपदा' घोषित करने के विचार का आर्कटिक देश विरोध करते हैं।
विदेश मंत्रालय ने समिति को बताया कि भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक दोनों क्षेत्रों में नियम आधारित व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध है और खुद को विज्ञान आधारित तथा पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार देश के रूप में देखता है।
मंत्रालय ने कहा कि इन क्षेत्रों में भारत की राजनीतिक और वैज्ञानिक भागीदारी इसी दृष्टिकोण से निर्देशित है। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों के संचालन और सतत विकास से जुड़े क्षेत्रों में सहयोग पर भी जोर दिया जा रहा है। गहरे समुद्र में खनन और मत्स्य पालन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत भारत अपनी जिम्मेदारियों के अनुसार रचनात्मक भूमिका निभाएगा।
समिति ने बताया कि आर्कटिक क्षेत्र 66 डिग्री उत्तरी अक्षांश से ऊपर के क्षेत्रों को माना जाता है, जबकि अंटार्कटिक क्षेत्र सामान्यत: 60 डिग्री दक्षिणी अक्षांश के नीचे के क्षेत्रों को संदर्भित करता है। दोनों क्षेत्र पृथ्वी की करीब 90 प्रतिशत बर्फ की चादर को समेटे हुए हैं और दुनिया के 70 प्रतिशत मीठे पानी के भंडार का स्रोत हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्कटिक एक ऐसा समुद्री क्षेत्र है, जो चारों ओर से भूभाग से घिरा है, जबकि अंटार्कटिक एक ऐसा भूभाग है, जो समुद्र से घिरा हुआ है।
समिति के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा वहां के देशों के संप्रभु क्षेत्रों में आता है और यहां करीब 40 लाख लोग रहते हैं, जिनमें लगभग 10 प्रतिशत लोग स्थानीय मूल निवासी हैं।
समिति को बताया गया कि अंटार्कटिका संयुक्त राष्ट्र के प्रत्यक्ष अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाला एकमात्र महाद्वीप है और इसका संचालन अंटार्कटिक संधि प्रणाली के तहत होता है। इसका क्षेत्रफल भारत से करीब पांच गुना अधिक है और कुछ स्थानों पर यहां बर्फ की मोटाई 4.5 किलोमीटर तक है। यदि अंटार्कटिका की पूरी बर्फ पिघल जाए तो समुद्र का जलस्तर करीब 60 मीटर तक बढ़ सकता है।
समिति ने कहा कि भारत की 11,000 किलोमीटर से अधिक लंबी समुद्री तटरेखा और कई द्वीप होने के कारण समुद्र के जल स्तर में वृद्धि का देश पर महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव पड़ेगा। अंटार्कटिका और आर्कटिक के आसपास समुद्री बर्फ के पिघलने से भारतीय मानसून प्रणाली पर भी असर पड़ सकता है।
समिति ने कहा कि अंटार्कटिका में भारत की निरंतर मौजूदगी अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में उसकी भूमिका को मजबूत करती है, ध्रुवीय शासन व्यवस्था में विश्वसनीयता बढ़ाती है और भविष्य की वैश्विक चर्चाओं के लिए तैयारी सुनिश्चित करती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत की वैज्ञानिक गतिविधियों ने अत्यधिक विषम परिस्थितियों में तकनीकी विकास, लॉजिस्टिक क्षमता और मानव संसाधन निर्माण में भी योगदान दिया है।
समिति ने कहा कि रणनीतिक और आर्थिक क्षमताओं के विकास को देखते हुए भारत को एक दीर्घकालिक नीति तैयार करनी चाहिए, जो उभरती चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत को प्रमुख भूमिका निभाने में सक्षम बनाए।
समिति ने कहा कि आर्कटिक परिषद के सभी सदस्य देशों और जापान, चीन, सिंगापुर तथा दक्षिण कोरिया जैसे कई पर्यवेक्षक देशों के पास 'ध्रुवीय/आर्कटिक राजदूत' और इस विषय से संबंधित अलग विभाग या प्रकोष्ठ हैं। ऐसे में भारत के लिए भी ध्रुवीय क्षेत्रों से विशेष रूप से निपटने के लिए समान स्तर का राजदूत नियुक्त करना जरूरी है।
समिति ने कहा, ''ऐसा पद सृजित करने से न केवल भारत अपनी विदेश नीति में इन क्षेत्रों के महत्व को प्रदर्शित कर सकेगा, बल्कि ध्रुवीय क्षेत्रों से जुड़े अपने नीतिगत रुख को प्रभावी ढंग से सामने रख सकेगा और ध्रुवीय राजनय को आगे बढ़ा सकेगा।''
समिति ने सरकार से ध्रुवीय क्षेत्रों में सहयोग और भागीदारी बढ़ाने के लिए 'ध्रुवीय राजदूत' नियुक्त करने पर विचार करने की सिफारिश की है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अंटार्कटिका में भारत के दो अनुसंधान केंद्र 'मैत्री' और 'भारती' हैं। 'मैत्री' को 1989 में शिरमाकर ओएसिस क्षेत्र में बर्फ रहित स्थिर भूमि पर स्थापित किया गया था, जबकि आधुनिक अनुसंधान केंद्र 'भारती' को 2012 में मैत्री स्टेशन से करीब 2,500 किलोमीटर पूर्व स्थित प्रिंसेस एलिजाबेथ लैंड में बनाया गया।
समिति ने भारत की दीर्घकालिक वैज्ञानिक उपस्थिति को मजबूत करने और ध्रुवीय मामलों में अग्रणी देशों की सूची में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नए 'मैत्री स्टेशन' का निर्माण जल्द पूरा करने की भी सिफारिश की है।
भाषा मनीषा माधव
माधव
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