मुथंगा प्रदर्शन: पुलिसकर्मी की हत्या के मामले में 56 लोग बरी, हत्या के प्रयास में चार दोषी करार
पवनेश
- 31 Jul 2026, 04:44 PM
- Updated: 04:44 PM
वायनाड (केरल), 31 जुलाई (भाषा) वायनाड की एक अदालत ने 2003 में मुथंगा आंदोलन के दौरान पुलिस आरक्षी के वी विनोद की हत्या के मामले में शुक्रवार को आदिवासी नेता एम.जी. गीतानंदन समेत 56 आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि हत्या के प्रयास के संबंधित मामले में उन्हें और तीन अन्य लोगों को दोषी ठहराया।
वायनाड जिला और सत्र न्यायाधीश अय्यूब खान ई ने विनोद हत्याकांड में दूसरे आरोपी अशोकन को दोषी ठहराया, जबकि अन्य सभी जीवित आरोपियों को बरी कर दिया। हालांकि चूंकि मुकदमे की कार्यवाही के दौरान ही अशोकन की मौत हो गई थी, इसलिए उसे कोई सजा नहीं सुनाई गई।
इसी घटना के दौरान पुलिस अधिकारी अब्दुल सलाम और वन अधिकारी शशिधरन की हत्या की कोशिश के एक संबंधित मामले में, अदालत ने गीतानंदन, बिनु, रमेशन और अनिलकुमार को दोषी पाया तथा उन्हें पांच साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई।
हालांकि अलग-अलग धाराओं के तहत उन्हें कुल 19 साल की सज़ा सुनाई गई है, लेकिन अदालत ने निर्देश दिया कि सजाएं एक साथ चलेंगी तथा उन्हें पांच साल तक जेल में रहना होगा।
अदालत ने पीड़ित मुआवजा योजना के तहत मुआवज़ा देने का भी निर्देश दिया। अदालत ने व्यवस्था दी कि विनोद के परिवार को सात लाख रुपये, अब्दुल सलाम को पांच लाख रुपये और शशिधरन को दो लाख रुपये दिए जाएं।
कन्नूर निवासी विनोद की मौत 19 फरवरी 2003 को उस पुलिस कार्रवाई के दौरान हुई थी, जिसमें जमीन के अधिकार की मांग को लेकर मुथंगा वन्यजीव अभयारण्य में जमीन पर कब्ज़ा करने वाले आदिवासी प्रदर्शनकारियों को हटाया जा रहा था।
इस मामले की शुरुआती जांच स्थानीय पुलिस ने की थी, जिसके बाद इसे अपराध शाखा और बाद में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, थकाराप्पाडी के गौदानवयाल में विरोध-प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने विनोद और वन अधिकारी शशिधरन को एक अस्थायी शेड में बंधक बना लिया था। वहां आदिवासी नेताओं-- सी.के. जानू और एम.जी. गीतानंदन के नेतृत्व में ज़मीन पर कब्ज़े का 47 दिन से चल रहा विरोध-प्रदर्शन अपने चरम पर पहुंच गया था।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि बंधक रखे जाने के दौरान विनोद की हत्या कर दी गई।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 47 गवाहों की गवाही सुनी। मुकदमा लंबित रहने के दौरान करीब 15 आरोपियों की मौत हो गयी।
बचाव पक्ष के वकील ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अदालत ने सजा सुनाते समय आरोपियों की पृष्ठभूमि का ध्यान रखा तथा कहा कि मुथंगा एक सही मकसद के लिए किया गया आंदोलन था।
हत्याकांड में आरोपियों के बरी होने पर निराशा व्यक्त करते हुए विनोद के भाई और सेवानिवृत सहायक पुलिस अधीक्षक के वी बाबू ने कहा कि परिवार ने इंसाफ के लिए 23 साल प्रतीक्षा की है।
उन्होंने पत्रकारों से कहा,''हमने भारी मन से फैसला सुना। साढ़े तेईस साल के इंतज़ार के बाद यह बहुत निराशाजनक है। यह सिर्फ़ हमारे परिवार की बात नहीं है, बल्कि पुलिस बल और समाज की भी बात है।''
बाबू ने आरोप लगाया कि मामले की जांच और मुकदमे में कमियां थीं। उन्होंने कहा कि परिवार आगे की क़ानूनी कार्रवाई के बारे में फ़ैसला करने से पहले क़ानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेगा।
मुथंगा आंदोलन 2003 में 'आदिवासी गोत्र महा सभा' के नेतृत्व में ज़मीन के अधिकारों के लिए चलाया गया एक आंदोलन था। इसमें मांग की गई थी कि तत्कालीन संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार भूमिहीन आदिवासी परिवारों को ज़मीन देने का अपना वादा पूरा करे।
इस आंदोलन के तहत, सैकड़ों आदिवासी परिवारों ने मुथंगा वन्यजीव अभयारण्य में प्रवेश किया और जंगल की ज़मीन पर कब्ज़ा करके अस्थायी ठिकाने बना लिए। जब पुलिस और वन विभाग ने प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए 19 फरवरी, 2003 को अभियान चलाया तब प्रदर्शन हिंसक हो गया।
भाषा
राजकुमार पवनेश
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3107 1644 वायनाड