अदालत ने नाबालिग के गर्भपात मामले में चिकित्सक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही में दखल से इनकार किया
वैभव
- 06 Aug 2026, 06:27 PM
- Updated: 06:27 PM
नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने 16 वर्षीय किशोरी का कथित रूप से अवैध गर्भपात करने और इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को नहीं देने के आरोपी चिकित्सक के खिलाफ जारी आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।
चिकित्सक ने दावा किया था कि गर्भपात के समय किशोरी की उम्र 20 वर्ष बताई गई थी और उसने प्रक्रिया के लिए अपनी सहमति दी थी। हालांकि, न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि कानून के तहत उम्र का सत्यापन कर उसे दर्ज करना अनिवार्य है, केवल असत्यापित मौखिक दावे को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है।
न्यायमूर्ति कौरव ने कहा कि गर्भ का चिकित्सकीय समापन (एमटीपी) अधिनियम के अनुसार नाबालिग अपने स्तर पर गर्भपात के लिए वैध सहमति देने में सक्षम नहीं होती और उसके गर्भ का समापन अभिभावक की लिखित सहमति के बिना नहीं किया जा सकता।
अदालत ने पांच अगस्त के अपने फैसले में कहा, ''एमटीपी अधिनियम के तहत मरीज की आयु महत्वपूर्ण शर्त है। ऐसे में केवल साथ आए व्यक्ति के मौखिक दावे के आधार पर उम्र स्वीकार कर लेने से पंजीकृत चिकित्सक अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। कानून की पूरी व्यवस्था इस बात पर आधारित है कि उम्र का सत्यापन कर उसका रिकॉर्ड तैयार किया जाए, न कि बिना किसी दस्तावेजी पुष्टि के मौखिक जानकारी पर भरोसा किया जाए, खासकर तब जब बाद में जांच में पता चला कि मरीज के साथ आया व्यक्ति पीड़िता का कोई रिश्तेदार भी नहीं था।''
उच्च न्यायालय के समक्ष चिकित्सक ने निचली अदालत के सितंबर 2020 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें यह जांच आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए थे कि क्या चिकित्सकों ने किशोरी के नाबालिग होने की जानकारी होने के बावजूद उसका गर्भपात किया और फिर जानबूझकर पुलिस को इस मामले की सूचना नहीं दी।
इसके बाद पूरक आरोपपत्र दाखिल किया गया, जिसमें चिकित्सक को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 313 (महिला की सहमति के बिना गर्भपात कराना) समेत विभिन्न धाराओं के तहत एकमात्र आरोपी बनाया गया।
मामले का संज्ञान लेते हुए निचली अदालत ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 भी लागू की और चिकित्सक को तलब किया।
पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 के तहत चिकित्सकों के लिए किसी नाबालिग के गर्भवती होने की सूचना देना अनिवार्य है, जबकि धारा 21 इस दायित्व का पालन नहीं करने पर दंड का प्रावधान करती है।
पीड़िता ने अपने बयान में आरोप लगाया कि जुलाई 2019 में सह-आरोपी महिला नाबालिग की आंटी बनकर उसे अस्पताल ले गई थी और उसने अस्पताल के कर्मचारियों से कहा कि गर्भ में बच्चा उसके प्रेमी का है और उसने लड़की की उम्र 20 वर्ष दर्ज करा दी।
लड़की छह सप्ताह की गर्भवती थी।
उच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष के अनुसार गर्भपात की प्रक्रिया के दौरान ही चिकित्सक को किशोरी के नाबालिग होने की जानकारी हो गई थी, लेकिन पॉक्सो अधिनियम के तहत प्राथमिकी गर्भपात के करीब 70 दिन बाद दर्ज हुई क्योंकि चिकित्सक ने इसकी सूचना नहीं दी।
अदालत ने यह भी कहा कि अस्पताल में भर्ती के समय न तो किशोरी का कोई पहचान पत्र लिया गया और न ही किसी प्रकार का आवास संबंधी प्रमाण पत्र। ऐसे में अभियोजन के रिकॉर्ड से चिकित्सक के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है और इस पर मुकदमा चलाया जाना उचित है।
अदालत ने कहा कि गर्भ का चिकित्सकीय समापन (एमटीपी) अधिनियम मांग पर बिना शर्त गर्भपात की अनुमति देने के लिए नहीं बनाया गया है। किसी गर्भवती महिला की आयु का सत्यापन गर्भ समापन करने वाले पंजीकृत चिकित्सक की मूल जिम्मेदारी है।
अदालत ने कहा, ''जो चिकित्सक आयु का सत्यापन नहीं करता या केवल मौखिक रूप से बताई गई उम्र के आधार पर, बिना किसी दस्तावेज के गर्भपात करता है, वह केवल प्रक्रियागत चूक नहीं करता, बल्कि कानून द्वारा निर्धारित पूरी व्यवस्था को ही निष्प्रभावी कर देता है।''
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