तमिलनाडु ने धर्मांतरित मुसलमानों को आरक्षण का लाभ देने को सही ठहराया, न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा
नरेश
- 07 Aug 2026, 05:16 PM
- Updated: 05:16 PM
नयी दिल्ली, सात अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को तमिलनाडु सरकार की मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली एक याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। उच्च न्यायालय ने कहा था कि इस्लाम अपनाने वाला कोई व्यक्ति सिर्फ धर्म परिवर्तन के आधार पर 'पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)' श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा करने का हकदार नहीं है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा की दलीलें सुनीं, जिन्होंने उस आदेश को रद्द करने की अपील की थी।
रोहतगी ने कहा कि राज्य सरकार के नौ मार्च, 2024 के आदेश का मकसद यह पक्का करना था कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के लोगों को सिर्फ इस्लाम अपनाने की वजह से आरक्षण का फायदा न मिले, ऐसा न हो।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के आदेश ने धर्म परिवर्तन के बावजूद सकारात्मक कार्रवाई के लाभों को बनाए रखकर समान अवसर की स्थिति पैदा की है।
उच्च न्यायालय में प्रतिवादी यानी मूल याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन पेश हुए।
अदालत का यह फैसला समीर अहमद की याचिका पर आया है, जिन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया था और 2016 में एक गजट अधिसूचना के जरिए इस धर्म परिवर्तन की जानकारी दी गई थी।
इसके बाद उन्होंने इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की और आरक्षण का लाभ उठाने के लिए "मुस्लिम लेब्बाई" समुदाय से संबंधित होने का प्रमाण-पत्र मांगा।
तहसीलदार ने उनका आवेदन खारिज कर दिया, जिसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।
सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर, उसे उन पात्र व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) समुदाय का प्रमाण-पत्र जारी करने का अधिकार है, जिन्होंने पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों (एससी) में से इस्लाम धर्म अपना लिया था।
पीठ ने इस मामले पर राज्य सरकार की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
राज्य सरकार ने थूथुकुडी जिले के जिला कलेक्टर और मंडलीय राजस्व अधिकारी के जरिए अपनी याचिका दायर की। ये अधिकारी सरकारी आदेश (जीओ) संख्या 31 को असंवैधानिक घोषित किए जाने और इसके नतीजों-जिनका असर पूरे राज्य पर पड़ने वाला था- से व्यथित थे।
राज्य सरकार की अपील में कहा गया है कि जिस फैसले को चुनौती दी गई है, वह एक विशेषज्ञ वैधानिक आयोग की सिफारिश पर बनाई गई कार्यकारी नीति में दखल देने की स्वीकार्य सीमा से जुड़े अहम सवाल खड़े करता है।
इसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता समीर अहमद ने 'मुस्लिम लेब्बाई' के तौर पर पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) समुदाय का प्रमाणपत्र जारी करने के लिए दिए गए अपने आवेदन को खारिज किए जाने को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था।
भाषा प्रशांत नरेश
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