बी सी खंडूरी का भाजपा में महत्वपूर्ण मुकाम हासिल करना महज एक संयोग था
राजकुमार
- 19 May 2026, 03:52 PM
- Updated: 03:52 PM
देहरादून, 19 मई (भाषा) देहरादून में मंगलवार को 91 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र (बी सी) खंडूरी का भाजपा में महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुंचना महज एक संयोग ही था क्योंकि 1991 में पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट से टिकट की पार्टी की पेशकश को पहले उन्होंने ठुकरा दिया था।
इसके कारणों का खुलासा करते हुए खंडूरी ने स्वयं बताया था कि इस सीट से उनके ममेरे भाई विजय बहुगुणा को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में उतारे जाने की संभावना थी और वह उन्हें चुनौती नहीं देना चाहते थे।
हालांकि, बाद में ऐन वक्त पर उनके मामा और कद्दावर नेता रहे हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगणा को टिकट नहीं मिला जिसके बाद खंडूरी ने भाजपा प्रत्याशी के रूप में सीट से पर्चा भरा।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता सतपाल महराज के खिलाफ पौड़ी लोकसभा सीट की जनता ने एक फौजी को तरजीह दी और अपने नेता बहुगुणा की राजनीतिक विरासत खंडूरी को सौंप दी । इस जीत ने खंडूरी को खासी प्रसिद्धि दिलायी ।
एक अक्टूबर 1934 को जन्मे खंडूरी ने 1991 के बाद इस सीट का प्रतिनिधित्व 1998, 1999, 2004 और 2014 में भी किया । इसके अलावा 2007-2012 के बीच वह दो बार राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे।
'जनरल साहब' के रूप में विख्यात सेना में इंजीनियर रहे खंडूरी को 1992 में भाजपा संसदीय दल का मुख्य सचेतक बनाया गया । इसके बाद 1996 में सतपाल महाराज के हाथों उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा लेकिन उन्हें भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई का उपाध्यक्ष बनाया गया।
वर्ष 1998 में वह पौड़ी गढवाल सीट से फिर निर्वाचित हुए और दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान उन्होंने फिर भाजपा संसदीय दल के मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी संभाली ।
वर्ष 2000 में, अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में उन्हें केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया और तीन वर्ष बाद उन्हें कैबिनेट मंत्री के रूप में पदोन्नत किया गया ।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की राष्ट्रीय राजमार्ग विकास योजना को जमीन पर उतारा और देश के प्रमुख शहरों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना और उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गलियारा परियोजना को आकार दिया।
खंडूरी 2004 में लगातार तीसरी बार फिर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए । हालांकि, केंद्र में राजग की सरकार सत्ता से बाहर हो गयी ।
वर्ष 2007 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने चुनाव संचालन की जिम्मेदारी खंडूरी की सौंपी और चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, उनके कड़क और ईमानदार फैसलों से असंतुष्ट पार्टी के एक गुट द्वारा उनके खिलाफ अभियान भी चलाया गया । वर्ष 2009 लोकसभा चुनाव में राज्य की पांचों सीट पर पार्टी को मिली पराजय का जिम्मा लेते हुए उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया ।
साफ-सुथरी और ईमानदार छवि के मालिक खंडूरी ने अपने पहले कार्यकाल में कई सुधारात्मक, खासतौर से भूमि और उद्योगों से संबंधित मामलों में, महत्वपूर्ण फैसले किए । उनके कार्यकाल में ही राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए पहली सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) नीति लायी गयी ।
बाद में, पार्टी की छवि को सुधारने के लिए 2012 विधानसभा चुनाव से पहले 2011 में उन्हें फिर से राज्य सरकार की कमान सौंप दी गयी। अपने दूसरे कार्यकाल में खंडूरी राज्य के लिए पहला लोकायुक्त विधेयक लाए जिसे विधानसभा से सर्वसम्मति से पारित किया गया ।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सिर्फ एक सीट के अंतर से सत्ता से बाहर हो गयी तथा खंडूरी मुख्यमंत्री रहते हुए कोटद्वार से अपनी सीट हार गए । कांग्रेस सत्ता में आयी और विजय बहुगुणा प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने । एक अनौपचारिक मुलाकात में बहुगुणा ने मजाक में कहा था, ''हम दोनों भाइयों ने सोचा कि बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनेंगे।''
एक रोचक तथ्य यह भी है कि उनकी बेटी और विधानसभा की अध्यक्ष रितु खंडूरी भूषण वर्तमान में कोटद्वार सीट से ही विधायक हैं।
भाषा दीप्ति राजकुमार
राजकुमार
1905 1552 देहरादून