पीढ़ियों के बीच लोकप्रिय रस्किन बांड 92 साल के हुए
नरेश
- 19 May 2026, 06:05 PM
- Updated: 06:05 PM
नयी दिल्ली, 19 मई (भाषा) पाठकों और प्रशंसकों की कई पीढ़ियों के बीच लोकप्रिय लेखक रस्किन बॉन्ड मंगलवार को 92 वर्ष के हो गए। 75 साल से कथा लेखन क्षेत्र में सक्रिय रस्किन बॉन्ड की करीब 500 कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
रस्किन बॉन्ड ने साहित्य से जुड़े तमाम विषयों को छुआ है - मौसम और मानवीय भावनाओं से लेकर दर्शन, हास्य, भय, रोमांच और रोजमर्रा की जिंदगी तक। उनकी कृतियों में पर्वतीय धुंध, रेलवे स्टेशन, शरारती बच्चे, अकेला यात्री और छोटे शहरों की लुप्त होती जिंदगी का खूबसूरत चित्रण मिलता है।
उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में ''द रूम ऑन द रूफ'' शामिल है जिससे रस्किन बॉन्ड के साहित्यिक जीवन की शुरुआत हुई। उस समय बॉन्ड मात्र 17 वर्ष के थे और उनके इस उपन्यास को कई प्रकाशकों ने छापने से मना कर दिया था। अंतिम प्रकाशन से पहले इसमें व्यापक संशोधन किए गए थे। आज के समय में यह एक प्रतिष्ठित 'क्लासिक' है और बॉन्ड की व्यक्तिगत पसंदीदा रचना बनी हुई है।
अर्ध-आत्मकथात्मक प्रकृति के इस उपन्यास में औपनिवेशिक काल के बाद के भारत में रहने वाले एक अनाथ एंग्लो-इंडियन किशोर 'रस्टी' की कहानी है, जो अकेलापन, पहचान और स्वतंत्रता की इच्छा से जूझता है।
''द ब्लू अम्ब्रेला'' लेखक की सबसे मार्मिक और प्रिय कहानियों में से एक है, जो अपनी सादगी और आकर्षण के लिए चर्चित है। यह हिमालय के एक छोटे से गांव की पृष्ठभूमि में रची गई है जिसमें बिन्या नामक एक लड़की की कहानी है। मासूमियत, ईर्ष्या, दया और मुक्ति की इस कोमल कहानी के जरिए बॉन्ड सहजता से पर्वतीय जीवन की सुंदरता और मानवीय स्वभाव की जटिलताओं को खूबसूरती से दर्शाते हैं।
वर्ष 2005 में इस कहानी पर इसी नाम से हिंदी फिल्म बनी जिसका निर्देशन फिल्मकार विशाल भारद्वाज ने किया था। इसे सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
उनकी चर्चित और लोकप्रिय कृतियों में ''लोन फॉक्स डांसिंग: माई ऑटोबायोग्राफी'' शामिल है। यह किताब आत्मकथा और संस्मरण का मिश्रण है जो बॉन्ड के बचपन, अकेलापन, प्रकृति प्रेम और भारत की पहाड़ियों और छोटे कस्बों में पले-बढ़े एक लेखक के रूप में उनकी यात्रा का वर्णन करती है।
उनकी अन्य चर्चित एवं पसंदीदा कृतियों में ''दिल्ली इज नॉट फार'', '' टाइम स्टॉप्स एट शामली'' आदि भी शामिल हैं। बॉन्ड अपने जीवंत पात्रों और कहानी कहने की शैली के माध्यम से स्मृति, एकांत, मानवीय जुड़ाव और बीते हुए समय जैसे विषयों का अन्वेषण करते हैं।
भाषा अविनाश नरेश
नरेश
1905 1805 दिल्ली