नागरिक संस्थाओं का बचाव न करना न्यायपालिका की सबसे बड़ी विफलता : अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह
दिलीप
- 20 May 2026, 07:43 PM
- Updated: 07:43 PM
नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अपनी नयी पुस्तक ''द कॉन्स्टिट्यूशन इज माय होम'' में लिखा है कि नागरिक संस्थाओं को उत्पीड़न से बचाने में न्यायपालिका की असफलता उसकी ''सबसे बड़ी विफलता'' है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों को आपराधिक कानूनों के माध्यम से सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
बुधवार को इस पुस्तक का विमोचन हुआ। इसमें लेखिका ने नागरिक संस्थाओं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का ''एकमात्र रक्षक'' बताया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच, विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) लाइसेंस रद्द करने और आयकर विभाग के छापों जैसी कार्रवाई के जरिए नागरिक संस्थाओं को दबाने का प्रयास किया है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता जयसिंह ने लिखा है, ''न्यायपालिका नागरिक संस्थाओं को उत्पीड़न से बचाने में असमर्थ रही है। मेरे लिए, यही इसकी सबसे बड़ी विफलता है। संविधान में जीवन और स्वतंत्रता से अधिक मूल्यवान कुछ भी नहीं है, और आज दोनों ही एक निष्क्रिय या सत्ता के प्रति अनुकूल न्यायपालिका के कारण खतरे में हैं।''
उन्होंने आरोप लगाया कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग ''न केवल छिटपुट मामलों में, बल्कि शासन की नीति के रूप में किया जा रहा है और यह वर्तमान सरकार की परिभाषित रणनीतियों में से एक रहा है।''
उन्होंने कहा, ''अभियोजन संबंधी विवेकाधिकार लगभग पूरी तरह से सत्ता में मौजूद पार्टी को सौंप दिया गया है। कानूनी भाषा की जगह अब एक नयी शब्दावली ने ले ली है: जो भी सत्तारूढ़ विचारधारा का विरोध करता है, उसे राष्ट्र का दुश्मन बताकर 'अर्बन नक्सल' या 'राष्ट्र-विरोधी' करार दिया जाता है।''
गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय के दिवंगत प्रोफेसर जी एन साईबाबा पर चलाए गए अभियोग का जिक्र करते हुए, उन्होंने न्यायिक टिप्पणियों की आलोचना की, जिसने आपराधिक कानून का ध्यान ''स्पष्ट कृत्यों'' से हटाकर ''धारणाओं और विचारों'' पर केंद्रित कर दिया।
लेखक-प्रकाशक ऋतु मेनन के साथ बातचीत पर आधारित जयसिंह की किताब ''द कॉन्स्टिट्यूशन इज माय होम'' देश की कुछ सबसे महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाइयों की पड़ताल करती है और वर्तमान समय पर तीखी टिप्पणियां प्रस्तुत करती है। इसमें बढ़ते हिंदू राष्ट्रवाद, पीछे हटती न्यायपालिका और दिन-ब-दिन कमजोर होती लोकतांत्रिक व्यवस्था के संदर्भ में गंभीर विश्लेषण किया गया है।
भाषा आशीष दिलीप
दिलीप
2005 1943 दिल्ली