दिल्ली में इस साल 2022 के बाद कार्बन मोनोऑक्साइड की सांद्रता सबसे अधिक दर्ज हुई
माधव
- 17 Jun 2026, 09:20 PM
- Updated: 09:20 PM
नयी दिल्ली, 17 जून (भाषा) दिल्ली में इस साल जनवरी से मई के पहले पांच महीनों के दौरान कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) की औसत सांद्रता 2022 के बाद से सबसे अधिक दर्ज की गई है।
थिंक टैंक और शोध एवं सलाहकार संस्था 'एन्वायरोकैटलिस्ट्स' द्वारा विश्लेषित आंकड़ों के आधार पर यह जानकारी सामने आई है।
आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष एक जनवरी से 31 मई तक कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) की औसत मात्रा 1.89 मिलीग्राम प्रति घन मीटर रही, जो 2022 के बाद इस अवधि का सबसे अधिक स्तर है। 2022 में यह 1.90 मिलीग्राम प्रति घन मीटर थी।
अन्य वर्षों में इसी अवधि का औसत इस प्रकार रहा— 2020 में 1.48 मिलीग्राम प्रति घन मीटर, 2021 में 1.89 मिलीग्राम प्रति घन मीटर, 2023 में 1.72 मिलीग्राम प्रति घन मीटर, 2024 में 1.64 मिलीग्राम प्रति घन मीटर और 2025 में 1.66 मिलीग्राम प्रति घन मीटर।
भारतीय मानकों के अनुसार कार्बन मोनोऑक्साइड की अधिकतम सुरक्षित सीमा चार मिलीग्राम प्रति सामान्य घन मीटर (8 घंटे का औसत) है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार यह सीमा चार मिलीग्राम प्रति सामान्य घन मीटर (24 घंटे का औसत) है।
कार्बन मोनोऑक्साइड एक विषैली, रंगहीन और गंधहीन गैस होती है, जो हीमोग्लोबिन से जुड़कर रक्त की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता को कम कर देती है। इसके उच्च स्तर के कारण हृदय और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति घट सकती है, जिससे सिरदर्द, चक्कर और थकान हो सकती है।
लंबे समय तक या ज्यादा कार्बन मोनोऑक्साइड के संपर्क में रहने से सीने में दर्द, दिल की धड़कन बढ़ने-कम होने और अन्य हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
'एन्वायरोकैटलिस्ट्स' के संस्थापक और मुख्य विश्लेषक सुनील दहिया ने कहा कि वाहनों की अधिक संख्या और उनसे होने वाले स्थानीय उत्सर्जन तथा अन्य पदार्थों के दहन से कार्बन मोनोऑक्साइड बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि बढ़ते स्तर यह दिखाते हैं कि शहर में दहन गतिविधियां बढ़ रही हैं, जिन्हें खासकर निजी वाहनों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कम करना जरूरी है, और इसके बजाय स्वच्छ इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन की ओर बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इससे न केवल प्रदूषण कम होगा, बल्कि शहर अधिक पैदल चलने योग्य, रहने योग्य और कम भीड़भाड़ वाला बनेगा।
यशोदा मेडिसिटी के श्वसन रोग विशेषज्ञ और इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी के निदेशक डॉ. राजेश कुमार गुप्ता ने कहा कि कार्बन मोनोऑक्साइड के उच्च स्तर के संपर्क में आने वाले लोगों को सिरदर्द, थकान, चक्कर, ध्यान लगाने में कठिनाई या सामान्य कमजोरी महसूस हो सकती है।
उन्होंने कहा, "क्योंकि ये लक्षण सामान्य होते हैं, इसलिए कई लोग समझ नहीं पाते कि इसका कारण प्रदूषित हवा हो सकती है।"
गुप्ता ने यह भी कहा कि बुजुर्गों के लिए खतरा और अधिक होता है, क्योंकि उनमें पहले से ही हृदय या फेफड़ों की समस्याएं हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि ऑक्सीजन की कमी से सांस फूलना, थकान और हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं, जिससे रोजमर्रा के काम करना मुश्किल हो जाता है।
भाषा जोहेब माधव
माधव
1706 2120 दिल्ली