महाराष्ट्र : अदालत ने पुनर्परीक्षा देने से रोके जाने के मामले में छात्रा को राहत देने से इनकार किया
मनीषा
- 19 Jun 2026, 05:53 PM
- Updated: 05:53 PM
मुंबई, 19 जून (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने ''गंभीर अवसाद और व्यक्तित्व विकार'' से पीड़ित मनोविज्ञान की एक छात्रा को कम उपस्थिति के कारण तीसरे वर्ष की पुनर्परीक्षा देने से रोके जाने के मामले में कोई राहत देने से इनकार कर दिया और कहा कि वह केवल उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त कर सकता है लेकिन कोई मदद नहीं कर सकता।
छात्रा के विश्वविद्यालय ने कम उपस्थिति के कारण तीसरे वर्ष की पुनर्परीक्षा में उसके शामिल होने पर रोक लगाई है।
एक खंडपीठ ने इस मामले में 16 जून को एक आदेश पारित किया, जिसकी प्रति शुक्रवार को उपलब्ध कराई गई।
खंडपीठ ने कहा कि शैक्षणिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होता है और शैक्षणिक संस्थान ही शैक्षणिक मानकों तथा उपस्थिति संबंधी आवश्यकताओं को विनियमित करने के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं।
न्यायमूर्ति आर. आई. छागला और न्यायमूर्ति फरहान दुबाश की खंडपीठ ने कहा कि वह लड़की की परिस्थितियों के प्रति ''असंवेदनशील'' नहीं है और वह उसके तथा उसके परिवार के प्रति अपनी गहरी सहानुभूति व्यक्त करती है।
न्यायालय ने कहा, ''सहानुभूति कानूनी अधिकार का विकल्प नहीं हो सकती। अदालत का संबंध निर्णय-प्रक्रिया की वैधता से होता है, न कि शैक्षणिक नियमों को फिर से लिखने या ऐसे अपवाद बनाने से, जिनकी स्वयं शासकीय ढांचा अनुमति नहीं देता।''
अदालत ने छात्रा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसके पास विश्वविद्यालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
तीसरे वर्ष की बैचलर ऑफ साइंस (एप्लाइड साइकोलॉजी) की छात्रा ने अपनी याचिका में मुंबई स्थित एक विश्वविद्यालय द्वारा कम उपस्थिति के कारण 15 अप्रैल को जारी किए गए निष्कासन पत्र को रद्द करने का अनुरोध किया था।
विश्वविद्यालय से अनुरोध किया गया था कि वह उसकी विशेष चिकित्सीय परिस्थितियों पर विचार करे और उसे इस महीने निर्धारित तीसरे वर्ष की पुनर्परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति दे।
छात्रा ने कहा कि पिछले सेमेस्टरों में उसकी उपस्थिति आवश्यक प्रतिशत से अधिक थी, और अंतिम सेमेस्टर (इस वर्ष) में उसके एक मानसिक (मनोचिकित्सकीय) स्थिति और व्यक्तित्व विकार का निदान हुआ, जिसके कारण वह अवसाद से पीड़ित रही।
याचिका में दावा किया गया कि इस वर्ष मार्च में लड़की को एक गंभीर चिकित्सीय स्थिति का सामना करना पड़ा, जिसमें उसे आत्महत्या के विचार आने लगे थे, जिसके बाद उसके माता-पिता उसे उत्तर प्रदेश स्थित उसके गृह नगर ले गए।
छात्रा के पिता ने इसकी जानकारी विश्वविद्यालय को दे दी थी, लेकिन बाद में उन्होंने उसकी कक्षाओं से अनुपस्थिति के संबंध में संस्थान को कोई और सूचना नहीं भेजी।
छात्रा के एक महीने तक अनुपस्थित रहने के बाद, विश्वविद्यालय ने 15 अप्रैल को एक निष्कासन पत्र जारी किया जिसमें उसे अंतिम सेमेस्टर की पुनर्परीक्षा में शामिल होने से रोक दिया गया।
इसके बाद छात्रा के पिता ने विश्वविद्यालय को ईमेल भेजकर अनुरोध किया कि उसे पुनर्परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए, लेकिन उस पर कोई जवाब नहीं मिला।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ऐसा कोई विशेष मामला नहीं पाया गया है, जिसके आधार पर वह हस्तक्षेप कर सके और निष्कासन पत्र को रद्द कर सके।
खंडपीठ ने कहा कि वह चिकित्सा विशेषज्ञ नहीं है कि वह चिकित्सकीय रिकॉर्ड और मनोरोग संबंधी मूल्यांकन की व्याख्या करे और स्वतंत्र रूप से इनका आकलन करे तथा शैक्षणिक मामलों में उसका दायरा सीमित है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान और अकादमिक निकाय ही शैक्षणिक मानकों तथा उपस्थिति संबंधी आवश्यकताओं को विनियमित करने के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं। साथ ही उसने कहा कि जब तक स्पष्ट रूप से मनमानी या विधिक प्रावधानों के उल्लंघन का मामला न हो, तब तक न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है।
भाषा देवेंद्र मनीषा
मनीषा
1906 1753 मुंबई