'जातिसूचक गालियों' को लेकर पुलिस एनडीएमसी कर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करे : अदालत
दिलीप
- 31 Jul 2026, 09:05 PM
- Updated: 09:05 PM
नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने पुलिस को एक महिला को कथित रूप से ''लगातार जातिसूचक गालियां देने तथा उसका अपमान एवं उत्पीड़न करने'' को लेकर नयी दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) के कई कर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है।
न्यायिक मजिस्ट्रेट रवि एक आवेदन पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
अदालत ने कहा, ''प्राथमिकी दर्ज करने की शर्त सबूत मांगना नहीं, बल्कि यह देखना है कि क्या किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी का खुलासा होता है।''
नयी दिल्ली नगरपालिका परिषद में 'डेटा एंट्री ऑपरेटर' के तौर पर काम करने वाली एक महिला ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि जब उसके सहकर्मियों को पता चला कि वह अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से है, तो उन्होंने अगस्त 2024 एवं मार्च 2025 के बीच उसे ''लगातार जातिसूचक गालियां दीं, उसका अपमान और उत्पीड़न किया। ''
महिला ने दावा किया कि उसने अपने संबंधित अधिकारी, एनडीएमसी के अध्यक्ष, मुख्य सतर्कता अधिकारी और अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के सामने बार-बार यह मुद्दा उठाया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।
याचिकाकर्ता ने कहा कि इसके बजाय, उसके खिलाफ कथित तौर पर एक 'मनगढंत' जवाबी शिकायत की गयी, जिसके परिणामस्वरूप उसे विभाग हटा दिया गया। अदालत ने गौर किया कि पुलिस ने अपनी कार्रवाई रिपोर्ट या वस्तुस्थिति रिपोर्ट में प्राथमिकी दर्ज न करने को यह कहते हुए उचित ठहराया था कि एक प्रारंभिक जांच की गई थी, जिसके दौरान किसी भी आरोपी ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया, तीन स्वतंत्र गवाहों ने उसके दावों की पुष्टि नहीं की, सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे और शिकायतकर्ता गाली-गलौज की कोई ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं करा सकी।
पुलिस ने यह भी कहा कि महिला की शिकायत, आरोपियों में से एक की ओर से पहले भेजे गए कानूनी नोटिस की वजह से हो सकती है।
बृहस्पतिवार को सुनाए गए आदेश में, मजिस्ट्रेट ने शीर्ष अदालत के 2013 के एक अहम फैसले (ललिता कुमारी केस, जिसमें कहा गया था कि अगर शुरुआती तौर पर किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए) का हवाला देते हुए कहा कि शुरुआती जांच को आरोपों की सच्चाई, विश्वसनीयता या सबूतों की अहमियत को परखने के लिए 'लघु मुकदमे' में नहीं बदला जा सकता।
मजिस्ट्रेट ने कहा, ''क्या स्वतंत्र गवाह आखिर में शिकायत करने वाली महिला की बात का समर्थन करते हैं, क्या उसका बयान भरोसेमंद है और क्या अपराध बिना किसी शक के साबित होता है - ये सभी सवाल जांच और सुनवाई के दौरान तय होंगे, न कि प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पहले से ज़रूरी शर्तें हैं।''
अदालत ने मंदिर मार्ग थाने के प्रभारी को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि पुलिस को 13 अगस्त तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करना होगा।
भाषा राजकुमार दिलीप
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