समानांतर तथ्यान्वेषण समिति का गठन पॉश अधिनियम के खिलाफ : दिल्ली उच्च न्यायालय
नरेश
- 01 May 2026, 07:49 PM
- Updated: 07:49 PM
नयी दिल्ली, एक मई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान व्यवस्था दी कि कार्यस्थल पर यौन दुर्व्यवहार के आरोपों की जांच के लिए आंतरिक शिकायत समिति गठित करने के स्थान पर या उससे पहले एक समानांतर तथ्यान्वेषण निकाय का गठन करना पॉश (पीओएसएच)अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है।
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013(पॉश अधिनियम) ने आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) या स्थानीय समिति के माध्यम से ऐसी शिकायतों से निपटने के लिए एक 'स्व-निहित तंत्र' बनाया है, और इसके विपरीत कोई भी दृष्टिकोण कानून के स्पष्ट प्रावधानों के साथ-साथ नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
अदालत ने 24 अप्रैल को दिये फैसले में कहा, ''एक बार जब विधायिका ने आईसीसी/स्थानीय समिति को ऐसी शिकायतों की जांच करने वाले प्राधिकरण के रूप में स्पष्ट रूप से नामित कर दिया है, तो किसी भी समानांतर या आईसीसी से पहले तथ्यान्वेषण निकाय का गठन कानूनी प्रावधान से इतर है।''
एकल पीठ ने कहा, ''किसी शिकायत को आईसीसी/स्थानीय समिति को भेजा जाना है या नहीं, यह निर्धारित करने के लिए तथ्यान्वेषण समिति का गठन करना पॉश अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध है और कानून में अस्वीकार्य है।''
अदालत ने यह फैसला दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध एक महाविद्यालय के प्राचार्य के खिलाफ पारित निलंबन आदेश को रद्द करते हुए सुनाया, जिन पर 2025 में तीन सहायक प्रोफेसरों ने यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था।
शिकायतों के बाद, दिल्ली विश्वविद्यालय के उप रजिस्ट्रार (कॉलेज) ने पहले आरोपों की जांच के लिए एक तथ्यान्वेषण समिति का गठन किया, जिसने बाद में सिफारिश की कि शिकायतों को आईसीसी को भेजा जाए।
याचिकाकर्ता ने समिति के गठन के साथ-साथ सितंबर 2025 में जारी अपने निलंबन के आदेश को भी चुनौती दी।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जांच के चरण में, नियोक्ता की भूमिका यह निर्धारित करने तक सीमित है कि क्या कर्मचारी को सेवा में बनाए रखने से जांच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा या अन्यथा यह सार्वजनिक हित में अवांछनीय है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि नियोक्ता को यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायत के मद्देनजर अंतरिम उपाय के रूप में निलंबित करने का अंतर्निहित अधिकार है, लेकिन वह किसी भी चुनिंदा आकलन के आधार पर निलंबन आदेश में आरोपों की प्रकृति का न्याय या सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं कर सकता है।
भाषा धीरज नरेश
नरेश
0105 1949 दिल्ली