नागरिक संस्थाओं का बचाव नहीं करना न्यायपालिका की सबसे बड़ी विफलता: अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह
दिलीप
- 20 May 2026, 09:08 PM
- Updated: 09:08 PM
नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अपनी नयी पुस्तक ''द कांस्टीट्यूशन इज माय होम'' में लिखा है कि नागरिक संस्थाओं को उत्पीड़न से नहीं बचाना न्यायपालिका की ''सबसे बड़ी विफलता'' है।
उन्होंने दावा किया कि राजनीतिक विरोधियों, कार्यकर्ताओं और मानवाधिकारों के पैरोकारों को आपराधिक कानून के माध्यम से सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
बुधवार को हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा जारी की गई पुस्तक में, लेखिका ने नागरिक संस्थाओं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का ''एकमात्र रक्षक'' बताया है। इसमें कहा गया है कि सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच, विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के तहत लाइसेंस रद्द करने और कर छापों जैसे उपायों से इसे दबाने की कोशिश की है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता जयसिंह ने लिखा, ''न्यायपालिका नागरिक संस्थाओं को उत्पीड़न से बचाने में असमर्थ रही है। मेरे लिए, यही इसकी सबसे बड़ी विफलता है। संविधान में जीवन और स्वतंत्रता से बढ़कर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, और एक निष्क्रिय या निर्देशों का पालन करने वाली न्यायपालिका के कारण आज ये दोनों खतरे में हैं।''
उन्होंने आरोप लगाया कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग ''न केवल छिटपुट मामलों में, बल्कि शासन की नीति के रूप में किया जा रहा है और यह वर्तमान सरकार की प्रमुख रणनीतियों में से एक है।''
उन्होंने कहा, ''अभियोजन के विवेकाधिकार को सत्तारूढ़ दल को सौंप दिया गया है। कानूनी भाषा की जगह एक नयी शब्दावली का प्रयोग किया जा रहा है। सत्तारूढ़ दल की विचारधारा का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को सरकार का शत्रु करार दिया जाता है, उसे अर्बन नक्सल या राष्ट्र-विरोधी बताया जाता है।''
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के दिवंगत प्रोफेसर जी एन साईबाबा पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत चलाए गए मुकदमे का जिक्र करते हुए उन्होंने न्यायिक टिप्पणियों की आलोचना की, जिनमें आपराधिक कानून का ध्यान ''स्पष्ट कृत्यों'' से हटाकर ''मान्यताओं और विचारधारा'' पर केंद्रित किया गया।
उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगों और भीमा कोरेगांव हिंसा से जुड़े मामलों में कार्यकर्ताओं और मानवाधिकारों के पैरोकारों के खिलाफ यूएपीए और भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत राजद्रोह के प्रावधान के इस्तेमाल की भी आलोचना की।
जयसिंह ने पुस्तक में लिखा, ''एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य में राजद्रोह का कोई स्थान नहीं है'' और तर्क दिया कि असहमति को उस वक्त तक अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसमें हिंसा का तत्व न हो।
उन्होंने कहा कि हालांकि उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह कानून को निलंबित रखा है, लेकिन यूएपीए के ''इसी तरह के प्रावधानों'' का इस्तेमाल मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ किया जा रहा है।
उन्होंने लिखा, ''अगर उच्चतम न्यायालय ने इस प्रावधान को रद्द कर दिया होता, तो हम इस स्थिति तक नहीं पहुंचते।''
यह पुस्तक लेखिका-प्रकाशक रितु मेनन के साथ जयसिंह की बातचीत पर आधारित है। पुस्तक देश के कुछ सबसे महत्वपूर्ण मुकदमों की तह तक जाती है और ''मौजूदा हालात पर तीक्ष्ण टिप्पणियां'' करती है।
भाषा सुभाष दिलीप
दिलीप
2005 2108 दिल्ली