अदालत का 2008 के सिलसिलेवार बम धमाकों में इंडियन मुजाहिदीन के सदस्य को जमानत देने से इनकार
दिलीप
- 07 Jul 2026, 08:53 PM
- Updated: 08:53 PM
नयी दिल्ली, सात जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने सितंबर 2008 में दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में मुकदमे का सामना कर रहे इंडियन मुजाहिदीन के एक संदिग्ध सदस्य को जमानत देने से इनकार कर दिया। इन धमाकों में 26 लोगों की मौत हुई थी।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने मंसूर असगर पीरभॉय की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने 19 जुलाई 2025 को निचली अदालत द्वारा करोल बाग धमाके से संबंधित प्राथमिकी में तीसरी बार जमानत से इनकार किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।
पीठ ने कहा कि हालांकि पीरभॉय ''लंबे समय से'' विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में है, लेकिन अभी दो गवाहों की जिरह बाकी है, ऐसे में उसे रिहा करने से मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। अदालत ने कहा कि आरोपी के जीवन के अधिकार के साथ-साथ उसकी रिहाई से आम नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के अधिकार पर भी विचार करना आवश्यक है।
पीठ ने कहा कि ''सुनियोजित सिलसिलेवार बम धमाकों'' में बड़ी संख्या में लोगों की मौत और घायल होने से ''भारी तबाही'' हुई और पीरभॉय पर गंभीर अपराधों का आरोप है, जिनकी सजा मृत्युदंड तक हो सकती है, इसलिए यह मामला जमानत देने योग्य नहीं है।
बहरहाल, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह उच्चतम न्यायालय के 30 अप्रैल के आदेश के अनुसार आठ महीने के भीतर मुकदमे का निपटारा करे।
दिल्ली के करोल बाग, कनॉट प्लेस और ग्रेटर कैलाश में 13 सितंबर 2008 को सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इसके अलावा तीन बम भी बरामद कर निष्क्रिय किए गए थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इन धमाकों से पूरे शहर में दहशत फैल गई थी। 26 लोगों की मौत हुई, 135 लोग घायल हुए और बड़े पैमाने पर संपत्ति का नुकसान हुआ था।
अभियोजन पक्ष ने बताया कि उसी दिन इंडियन मुजाहिदीन ने विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया संस्थानों को ईमेल भेजकर इन धमाकों की जिम्मेदारी ली थी। ईमेल में यह भी दावा किया गया था कि 13 मई 2008 को जयपुर और 26 अगस्त 2008 को अहमदाबाद में हुए धमाके भी इसी संगठन ने किए थे।
अदालत ने 61 पन्नों के फैसले में कहा कि प्रतिबंधित आतंकी संगठन के मीडिया प्रकोष्ठ के कथित प्रमुख एवं कंप्यूटर विशेषज्ञ पीरभॉय की प्रथम दृष्टया धमाकों से कुछ मिनट पहले इंडियन मुजाहिदीन के नाम से जिम्मेदारी वाला ईमेल भेजने में अहम भूमिका थी।
अदालत ने कहा कि इन सिलसिलेवार धमाकों को अंजाम देने के लिए जिस स्तर के ''समन्वय, योजना, वित्तपोषण, लॉजिस्टिक व्यवस्था और वास्तविक समय में संचार की आवश्यकता थी, वह केवल तकनीक के कुशल उपयोग से ही संभव था और ''प्रथम दृष्टया आरोपी इस पूरी साजिश के केंद्र में था।''
पीठ ने कहा कि आरोपी पर केवल एक आपराधिक कृत्य का नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता को प्रभावित करने वाली एक बड़ी आतंकी साजिश का हिस्सा होने का आरोप है।
अदालत ने यह भी कहा कि पीरभॉय की तकनीकी विशेषज्ञता और कथित नेतृत्वकारी भूमिका से प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट होता है कि उसका आतंकी संगठन और उसके नेटवर्क से गहरा संबंध था। अदालत ने कहा कि ऐसे में रिहा होने पर उसके दोबारा इसी तरह की गतिविधियों में शामिल होने की आशंका बहुत अधिक है।
वहीं, पीरभॉय ने दावा किया कि उसे फंसाया गया है और दिल्ली पुलिस के पास उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। उसने यह भी कहा कि वह लगभग 17 वर्षों से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में है।
अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि मुकदमे की सुनवाई प्रतिदिन की जा रही है और यह अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
भाषा गोला दिलीप
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