पुडुचेरी: जिपमेर के एक विभागाध्यक्ष के विरूद्ध महिला डॉक्टर के आरोप पर समिति ने कार्रवाई की संस्तुति की
अविनाश
- 20 May 2026, 07:10 PM
- Updated: 07:10 PM
नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) पुडुचेरी के प्रतिष्ठित जवाहरलाल स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (जिपमेर) की आंतरिक शिकायत समिति ने एक विभागाध्यक्ष को कनिष्ठ महिला डॉक्टर के खिलाफ अपने पद का दुरुपयोग करने का दोषी पाया है। समिति की जांच रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में विभागाध्यक्ष के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करते हुए कहा कि हालांकि यौन उत्पीड़न का विशिष्ट आरोप साबित नहीं हो सका, फिर भी प्रतिवादी (विभागाध्यक्ष) का समग्र आचरण स्पष्ट रूप से पेशेवर कदाचार को दर्शाता है, जिसके लिए उचित प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई आवश्यक है।
संस्थान के एक नवगठित विभाग की प्रथम वर्ष की जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर ने अपने विभागाध्यक्ष पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, जिसके बाद आठ सदस्यीय समिति का गठन किया गया। विभागाध्यक्ष ने संपर्क करने पर समिति की सिफारिशों पर कोई जवाब नहीं दिया।
विभागाध्यक्ष पर आठ खास आरोप लगाये गये थे जिनमें से दो सच पाये गये जबकि दो अन्य आरोप आंशिक रूप से साबित हुए।
विभागाध्यक्ष के खिलाफ यह आरोप सही पाया गया कि उसने जूनियर डॉक्टर के शोध प्रबंध विषय, छुट्टी और अन्य मामलों पर उसके पति से चर्चा की। महिला का पति उससे अलग रहता है और इसी अस्पताल में कार्यरत है।
समिति ने कहा कि शिकायतकर्ता की सहमति के बिना इस तरह आचरण निजता का अनुचित अतिक्रमण है।
समिति ने कहा कि विभागाध्यक्ष के कथित अनुचित व्यवहार के कारण महिला डॉक्टर को मानसिक तनाव होने संबंधी आरोप पूरी तरह सिद्ध नहीं हुए।
जूनियर डॉक्टर ने आरोप लगाया था कि विभागाध्यक्ष ने उसके लिए अनार का रस खरीदा और जब उसने वह पेय पी लिया, तो विभागाध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने उसके साथ उसी तरह का व्यवहार किया जैसा वह अपनी पत्नी के साथ करते हैं।
समिति ने कनिष्ठ चिकित्सक के आरोप को दर्ज करते हुए कहा, ''विभागाध्यक्ष ने कथित तौर पर यह भी कहा कि वह अपनी यौन क्षमता बढ़ाने के लिए नियमित रूप से अनानास का रस पीते हैं।''
समिति ने कहा कि लेकिन इस विशिष्ट आरोप पर उपलब्ध साक्ष्य संतुलित हैं और किसी भी पक्ष में झुकाव नहीं दिखाते हैं।
अपने समग्र निष्कर्ष में समिति ने कहा, "...यद्यपि विभागाध्यक्ष ने दलील दी है कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा कुछ नहीं किया तथा उनका बर्ताव शिकायतकर्ता के प्रति चिंता से प्रभावित था, फिर भी उनके आचरण के परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"
समिति ने कहा कि प्रतिवादी (विभागाध्यक्ष) के व्यवहार के परिणामस्वरूप अधिकार का दुरुपयोग, पेशेवर सीमाओं का उल्लंघन, शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत और शैक्षणिक स्वायत्तता में अनुचित हस्तक्षेप हुआ और यह पर्यवेक्षी भूमिका निभाने वाले संकाय सदस्य के लिए अशोभनीय आचरण है।
भाषा राजकुमार अविनाश
अविनाश
2005 1910 दिल्ली